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घर का दूध
11-03-2012, 03:47 AM
Post: #1
घर का दूध
[size=3]"बाबूजी, काटो मत, कितनी जोर से काटते हो? खा जाओगे क्या मेरी चूंची?" गुस्से से मंजू बाई चिल्लाई और फ़िर हंसने लगी.

मैं उस पर चढ़कर उसे चोद रहा था और उसकी एक चूंची मुंह में लेकर चूस रहा था. उसका छरहरा सांवला शरीर मेरे नीचे दबा था और उसकी मजबूत टांगें मेरी कमर के इर्द गिर्द लिपटी हुई थीं. मैं इतनी मस्ती में था कि वासना सहन नहीं होने से मैंने मंजू के निपल को दांतों में दबाकर चबा डाला था और वह चिल्ला उठी थी. मैंने उसकी बात को अनसुनी करके उसकी आधी चूंची मुंह में भर ली और फ़िर से उसे दांतों से कस कर काटने लगा.

उसके फ़िर से चीखने के पहले मैंने अपने मुंह से उसकी चूंची निकाली और उसके होंठों को अपने होंठों में दबाकर उसकी आवाज बंद कर दी. उसके होंठों को चूसते हुए मैं अब उसे कस कर चोदने लगा. वह भी ’अं ऽ अं ऽ’ की दबी आवाज निकालते हुए मुझसे चिपट कर छटपटाने लगी. यह उसके झड़ने के करीब आने की निशानी थी. जब वह मुंह हटाने की कोशिश करने लगी तो मैंने अपने दांतों में उसके होंठ दबा लिये, आंखों से अनकही धमकी दी कि काट खाऊंगा तो वह चुप हो गयी.

दो तीन और धक्कों के बाद ही उसके बंद मुंह से एक दबी चीख निकली और उसने अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी. उसका शरीर कड़ा हो गया और वह थरथराने लगी. उसकी चूत में से अब ढेर सा पानी बह रहा था. मैंने भी तीन चार और करारे धक्के लगाये और अपना लंड उसकी बुर में पूरा अंदर पेल कर झड़ गया.

थोड़ी देर बाद मैं लुढ़क कर उसके ऊपर से अलग हुआ और लेट कर सुस्ताने लगा. मंजू बाई उठकर अपने कपड़े पहनने लगी. उसकी चूंची पर मेरे दांतों के गहरे निशान बन गये थे, होंठ चूस चूस कर कुछ सूज से गये थे, उनपर भी दांतों के हल्के निशान बन गये थे. अपने मम्मों को सहलाते हुए वह मुझसे शिकायत करती हुई बोली. "बाबूजी, क्यों काटते हो मेरी चूंची को बार बार, मुझे बहुत दुखता है, परसों तो तुमने थोड़ा खून भी निकाल दिया था!" उसकी आवाज में शिकायत के साथ साथ हल्का सा नखरा भी था. उसे दर्द तो हुआ होगा पर मेरी उस जालिम हरकत पर मजा भी आया था.

मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुस्कराते हुए उसे बांहों में खींचकर उसके सांवले होंठों का चुंबन लेते हुए सोचने लगा कि क्या मेरी तकदीर है जो इतनी गरम चुदैल औरत मेरे पल्ले पड़ी है. एक नौकरानी थी पहले, अब मेरी प्रेमिका बन गयी थी मंजू बाई! यह अफ़साना कैसे शुरू हुआ उसे मैं याद कर रहा था.[/size]


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11-03-2012, 04:24 AM
Post: #2
RE: घर का दूध
मैं कुछ ही महने पहले यहां नौकरी पर आया था. बी ई करने के बाद यह मेरी पहली नौकरी थी. फ़ैक्टरी एक छोटे शहर कटनी के बाहर कैमोर गांव के पास थी, वहां कोई आना पसंद नहीं करता था इसलिये एक तगड़ी सैलरी के साथ कंपनी ने मुझे कॉलोनी में एक बंगला भी रहने को दे दिया था. कॉलोनी शहर से दूर थी और इसलिये नौकरों के लिये छोटे क्वार्टर भी हर बंगले में बने थे.

मैं अकेला ही था, अभी शादी नहीं हुई थी. मेरे बंगले के क्वार्टर में मंजू बाई पहले से रहती थी. उस बंगले में रहने वाले लोगों के घर का सारा काम काज करने के लिये कंपनी ने उसे रखा था. वह पास के ही गांव की थी पर उसे फ़्री में रहने के लिये क्वार्टर और थोड़ी तनखा भी कंपनी देती थी इसलिये वह बंगले पर ही रहती थी.

वैसे तो उसका पति भी था. मैंने उसे बस एक दो बार देखा था. शायद उसका और कहीं लफ़ड़ा था और शराब की लत भी थी, इसलिये मंजू से उसका खूब झगड़ा होता था. वह मंजू की गाली गलौज से घबराता था इसलिये अक्सर घर से महनों गायब रहता था.

मंजू मेरे घर का सारा काम करती थी और बड़े प्यार से मन लगाकर करती थी. खाना बनाना, कपड़े धोना, साफ़ सफ़ाई करना, मेरे लिये बाजार से जरूरत की सब चीजें ले आना, ये सब वही करती थी. मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होने देती थी. उसकी इमानदारी और मीठे स्वभाव के कारण उसपर मेरा पूरा भरोसा हो गया था. मैंने घर की पूरी जिम्मेदारी उसपर डाल दी थी और उसे ऊपर से तीन सौ रुपये और देता था इसलिये वह बहुत खुश थी.

उसके कहने से मैंने बंगले के बाथरूम में उसे नहाने धोने की इजाजत भी दे दी थी क्योंकि नौकरों के क्वार्टर में बाथरूम ढंग का नहीं था. गरीबी के बावजूद साफ़ सुथरा रहने का उसे शौक था और इसीलिये बंगले के बाथरूम में नहाने की इजाजत मिलने से वह बहुत खुश थी. दिन में दो बार नहाती और हमेशा एकदम साफ़ सुथरी रहती, नहीं तो नौकरानियां अक्सर इतनी सफ़ाई से नहीं रहतीं. मुझे वह बाबूजी कहकर बुलाती थी और मैं उसे मंजू बाई कहता था. मेरा बर्ताव उससे एकदम अच्छा और सभ्य था, नौकरों जैसा नहीं.

यहां आये दो महने हो गये थे. उन दो महनों में मैंने मंजू पर एक औरत के रूप में ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. मुझे उसकी उमर का भी ठीक अंदाज नहीं था, हां मुझ से काफ़ी बड़ी है यह मालूम था. इस वर्ग की औरतें अक्सर तीस से लेकर पैंतालीस तक एक सी दिखती हैं, समझ में नहीं आता कि उनकी असली उमर क्या है. कुछ जल्दी बूढ़ी लगने लगती हैं तो कुछ पचास की होकर भी तीस पैंतीस की दिखती हैं.

मंजू की उमर मेरे खयाल से सैंतीस अड़तीस की होगी. चालीस भी हो सकती थी पर वह इतनी बड़ी दिखती नहीं थी. लगती थी जैसे तीस के आसपास की जवान औरत हो. शरीर एकदम मजबूत, छरहरा और कसा हुआ था. काम करने की उसकी फ़ुरती देखकर मैं मन ही मन उसकी दाद देता था कि क्या एनर्जी है इस औरत में. कभी कभी वह पान भी खाती थी और तब उसके सांवले होंठ लाल हो जाते. मुझे पान का शौक नहीं है पर जब वह पास से गुजरती तो उसके खाये पान की सुगंध मुझे बड़ी अच्छी लगती थी.

अब इतने करीब रहने के बाद यह होना ही था कि धीरे धीरे मैं उसकी तरफ़ एक नौकरानी ही नहीं, एक औरत की तरह देखने लग जाऊं. मैं भी तेईस साल का जवान था, और जवानी अपने रंग दिखायेगी ही. काम खतम होने पर घर आता तो कुछ करने के लिये नहीं था सिवाय टी वी देखने के या पढ़ने के. कभी कभी क्लब हो आता था पर मेरे अकेलेपन के स्वभाव के कारण अक्सर घर में ही रहना पसंद करता. जब घर पर होता तो अपने आप नजर मंजू बाई पर जाती. मंजू काम करती रहती और मेरी नजर बार बार उसके फ़ुरतीले बदन पर जाकर टिक जाती. रात को प्लेबॉय देखकर मुठ्ठ मारते मारते कभी मन में उन गोरी गोरी औरतों के बजाय मंजूबाई आ जाती पर मैं कोशिश करके झड़ते वक्त और किसी को याद कर लेता. मंजू बाई के नाम से झड़ने की नौबत तक अभी मैं नहीं पहुंचा था. एक बार ऐसा हो जाता तो दिन में उसे देखने का मेरा ढंग बदल जायेगा ये मेरे को पता था.

ऐसा शायद चलता रहता पर तभी एक घटना ऐसी हुई कि मंजू के प्रति मेरी भावना अचानक बदल गयी.

एक दिन बैडमिन्टन खेलते हुए मेरे पांव में मोच आ गयी. पहले लगा था कि मामूली चोट है पर शाम तक पैर सूज गया. दूसरे दिन काम पर भी नहीं जा सका. डाक्टर की लिखी दवा ली और मरहम लगाया. पर दर्द कम नहीं हो रहा था. मंजू मेरी हालत देख कर मुझसे बोली. "बाबूजी, पैर की मालिश कर दूं?"

मैंने मना किया. मुझे भरोसा नहीं था, डरता था कि पैर और सूज न जाये. और वैसे भी एक औरत से पैर दबवाना मुझे ठीक नहीं लग रहा था. वह जिद करने लगी, मेरे अच्छे बर्ताव की वजह से मुझको अब वह बहुत मानती थी और मेरी सेवा का यह मौका नहीं छोड़ना चाहती थी "एकदम आराम हो जायेगा बाबूजी, देखो तो. मैं बहुत अच्छा मालिश करती हूं, गांव में तो किसी को ऐसा कुछ होता है तो मुझे ही बुलाते हैं"

उसके चेहरे के उत्साह को देखकर मैंने हां कर दी, कि उसे बुरा न लगे. उसने मुझे पलंग पर लिटाया और जाकर गरम करके तेल ले आयी. फ़िर पाजामा ऊपर करके मेरे पैर की मालिश करने लगी. उसके हाथ में सच में जादू था. बहुत अच्छा लग रहा था. काम करके उसके हाथ जरा कड़े और खुरदरे हो गये थे फ़िर भी उनका दबाव मेरे पैर को बहुत आराम दे रहा था.

पास से मैंने पहली बार मंजू को ठीक से देखा. वह मालिश करने में लगी हुई थी इसलिये उसका ध्यान मेरे चेहरे पर नहीं था. मैं चुपचाप उसे घूरने लगा. सादे कपड़ों में लिपटे उसके सीधे साधे रूप के नीचे छुपी उसकी मादकता मुझे महसूस होने लगी.

दिखने में वह साधारण थी. बाल जूड़े में बांध रखे थे उनमें एक फ़ूलों की वेणी थी. थी वह सांवली पर उसकी चमड़ी एकदम चिकनी और दमकती हुई थी. माथे पर बड़ी बिंदी थी और नाक में नथनी पहने थी. उसने गांव की औरतों जैसे धोती की तरह साड़ी लपेटी थी जिसमें से उसके चिकने सुडौल पैर और मांसल पिंडलियां दिख रही थीं. चोली और साड़ी के बीच दिखती उसकी पीठ और कमर भी एकदम सपाट और मुलायम थी. चोली के नीचे शायद वह कुछ नहीं पहनती थी क्योंकि कटोरी से तेल लेने को जब वह मुड़ती तो पीछे से उसकी चोली के पतले कपड़े में से ब्रा का कोई स्ट्रैप नहीं दिख रहा था.

आंचल उसने कमर में खोंस रखा था और उसके नीचे से उसकी छाती का हल्का उभार दिखता था. उसके स्तन ज्यादा बड़े नहीं थे पर ऐसा लगता था कि जितने भी हैं, काफ़ी सख्त और कसे हुए हैं. उसके उस दुबले पतले छरहरे पर एकदम स्वस्थ और कसे हुए चिकने शरीर को देखकर पहली बार मुझे समझ में आया कि जब किसी औरत को ’तन्वंगी’ कहते हैं, याने जिसका बदन किसी पेड़ के तने जैसा होता है, तो इसका क्या मतलब है.

उसके हाथों के स्पर्श और पास से दिखते उसके सादे पर तंदुरुस्त बदन ने मुझपर ऐसा जादू किया कि जो होना था वह हो कर रहा. मेरा लंड सिर उठाने लगा. मैं परेशान था, उसके सामने उसे दबाने को कुछ कर भी नहीं सकता था. इसलिये पलट कर पेट के बल सो गया. वह कुछ नहीं बोली, पीछे से मेरे टखने की मालिश करती रही. अब मैं उसके बारे में कुछ भी सोचने को आजाद था. मैं मन के लड्डू खाने लगा. मंजू बाई नंगी कैसी दिखेगी! उसे भींच कर उसे चोदने में क्या मजा आयेगा! मेरा लंड तन्ना कर खड़ा हो गया.

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11-03-2012, 04:24 AM
Post: #3
RE: घर का दूध
दस मिनिट बाद वह बोली. "अब सीधे हो जाओ बाबूजी, पैर मोड़ कर मालिश करूंगी, आप एकदम सीधे चलने लगोगे"

मैं आनाकानी करने लगा. "हो गया, बाई, अब अच्छा लग रहा है, तुम जाओ." आखिर खड़ा लंड उसे कैसे दिखाता! पर वह नहीं मानी और मजबूर होकर मैंने करवट बदली और कुरते से लंड के उभार को ढांक कर मन ही मन प्रार्थना करने लगा कि उसे न दिखे. वैसे कुरते में भी अब तंबू बन गया था जो छुपने की कोई गुंजाइश नहीं थी.

वह कुछ न बोली और पांच मिनिट में मालिश खतम करके चली गयी. "बस हो गया बाबूजी, अब आराम करो आप" कमरे से बाहर जाते जाते मुस्कराकर बोली "अब देखो बाबूजी, तुम्हारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी, मंजू है आपकी हर सेवा करने के लिये, बस आप हुकम करो" उसकी आंखों में एक चमक सी थी. मैं सोचता रहा कि उसके इस कहने में और कुछ मतलब तो नहीं छुपा.

उसकी मालिश से मैं उसी दिन चलने फ़िरने लगा. दूसरे दिन उसने फ़िर एक बार मालिश की, और मेरा पैर पूरी तरह से ठीक हो गया. इस बार मैं पूरा सावधान था और अपने लंड पर मैंने पूरा कंट्रोल रखा. न जाने क्यों मुझे लगा कि जाते जाते मंजू बाई कुछ निराश सी लगी, जैसे उसे जो चाहिये था वह न मिला हो.

अब उसको देखने की मेरी नजर बदल गयी थी. जब घर में होता तो उसकी नजर बचाकर उसके शरीर को घूरने का मैं कोई मौका नहीं छोड़ता. खाना बनाते समय जब वह किचन के चबूतरे के पास खड़ी होती तो पीछे से उसे देखना मुझे बहुत अच्छा लगता, उसकी चोली में से दिखती चिकनी पीठ और नाजुक लंबी गर्दन मुझ पर जादू सा कर देती, मैं बार बार किसी बहाने से किचन के दरवाजे से गुजरता और मन भर कर उसे पीछे से देखता. जब वह चलती तो मैं उसके चूतड़ों और चिकनी पिंडलियों को घूरता. उसके चूतड़ छोटे थे पर एकदम गोल और सख्त थे. जब वह अपने पंजों पर खड़ी होकर ऊपर देखते हुए कपड़े सुखाने को डालती तो उसके छोटे मम्मे तन कर उसके आंचल में से अपनी मस्ती दिखाने लगते.

रात को मैं अब खुल कर उसके बारे में सोचते हुए मुठ्ठ मारता. उसको चोद रहा हूं, उसके मम्मे चूस रहा हूं, या उसके उस मीठे मुंह से लंड चुसवा रहा हूं वगैरह वगैरह. अब तो मुठ्ठ मारने के लिये मुझे प्लेबॉय की भी जरूरत नहीं पड़ती थी, बस मंजू बाई को याद करता और शुरू हो जाता.

उसे भी मेरी इस हालत का अंदाजा हो गया होगा, आखिर मालिश करते समय कुर्ते के नीचे से मेरा खड़ा लंड उसने देखा ही था. पर नाराज होने और बुरा मानने के बजाय वह भी अब मेरे सामने कुछ कुछ नखरे दिखाने लगी थी. बार बार आकर मुझसे बातें करती, कभी बेमतलब मेरी ओर देखकर हल्के से हंस देती. उसकी हंसी भी एकदम लुभावनी थी, हंसते समय उसकी मुस्कान बड़ी मीठी होती और उसके सफ़ेद दांत और गुलाबी मसूड़े दिखते क्योंकि उसका ऊपरी होंठ एक खास अंदाज में ऊपर की ओर मुड़कर और खुल जाता.

मैं समझ गया कि शायद वह भी चुदासी की भूखी थी और मुझे रिझाने की कोशिश कर रही थी. आखिर उस जैसी गरीब नौकरानी को मेरे जैसा उच्च वर्गीय नौजवान कहां मिलने वाला था? उसका पति तो नालायक शराबी था ही, उससे संबंध तो मंजू ने कब के तोड़ लिये थे. मुझे पूरा यकीन हो गया कि बस मेरे पहल करने की देर है, यह शिकार खुद मेरे पंजे में आ फ़ंसेगा.

पर मैंने कोई पहल नहीं की. डर था कुछ लफ़ड़ा न हो जाये, और अगर मैंने मंजू को समझने में भूल की हो तो फ़िर तो बहुत तमाशा हो जायेगा. वह चिल्ला कर पूरी कॉलोनी सिर पर न उठा ले, कंपनी में मुंह दिखाने की जगह न मिलेगी, नौकरी भी छोड़ना पड़ेगी.

पर मंजू ने मेरी नजर की भूख पहचान ली थी. अब उसने आगे कदम बढ़ाना शुरू कर दिया. वह थी बड़ी चालाक, मेरे खयाल से उसने मन में ठान ली थी कि मुझे फ़ंसा कर रहेगी. अब वह जब भी मेरे सामने होती, तो उसका आंचल बार बार गिर जाता. खास कर मेरे कमरे में झाड़ू लगाते हुए तो उसका आंचल गिरा ही रहता. वैसे ही मुझे खाना परोसते समय उसका आंचल अक्सर खिसक जाता और वैसे में ही वह झुक झुक कर मुझे खाना परोसती. अंदर ब्रा तो वह पहनती नहीं थी इसलिये ढले आंचल के कारण उसकी चोली के ऊपर के खुले भाग में से उसके छोटे कड़े मम्मों और उनकी घुंडियों का आकार साफ़ साफ़ दिखता. भले छोटे हों पर बड़े खूबसूरत मम्मे थे उसके. बड़ी मुश्किल से मैं अपने आप को संभाल पाता, वरना लगता तो था कि अभी उन कबूतरों को पकड़ लूं और मसल डालूं, चूस लूं.

मैं अब उसके इस मोह जाल में पूरा फ़ंस चुका था. उसकी नजरों से नजर मिलाना मैंने छोड़ दिया था कि उसे मेरी नजरों की वासना की भूख न दिख न जाये. बार बार लगता कि उसे उठा कर पलंग पर ले जाऊं और कचाकच चोद मारूं. अक्सर खाना खाने के बाद मैं दस मिनिट बैठा रहता, उठता नहीं था कि मेरा तन कर खड़ा लंड उसे न दिख जाये.

यह ज्यादा दिन चलने वाला नहीं था. आखिर एक शनिवार को छुट्टी के दिन की दोपहर में बांध टूट ही गया. उस दिन खाना परोसते हुए मंजू चीख पड़ी कि चींटी काट रही है और मेरे सामने अपनी साड़ी उठाकर अपनी टांगों में चींटी को ढूंढने का नाटक करने लगी. उसकी भरी भरी सांवली चिकनी जांघें पहली बार मैंने देखीं. उसने सादी सफ़ेद पैंटी पहने हुई थी. उस तंग पैंटी में से उसकी फ़ूली बुर का उभार साफ़ दिख रहा था. साथ ही पैंटी के बीच के सकरे पट्टे के दोनों ओर से घनी काली झांटें बाहर निकल रही थीं. एकदम देसी नजारा था. और यह नजारा मुझे पूरे पांच मिनिट मंजू ने दिखाया. ’उई’ ’उई’ करती हुई मेरी ओर देखकर हंसते हुए वह चींटी ढूंढती रही जो आखिर तक नहीं मिली.

मैंने खाना किसी तरह खतम किया और आराम करने के लिये बेडरूम में आ गया. दरवाजा उढ़काकर मैं सीधा पलंग पर गया और लंड हाथ में लेकर हिलाने लगा. मंजू की वे चिकनी जांघें मेरी आंखों के सामने तैर रही थीं. मैं हथेली में लंड पकड़कर उसे मुठियाने लगा, मानों मंजू की उन टांगों पर उसे रगड़ रहा होऊं.

इतने में बेडरूम का दरवाजा खुला और मंजू अंदर आयी. उसके हाथ में मेरा कुरता पजामा था. शायद मुझे देने को आयी थी. मुझे मुठ्ठ मारते देख कर वहीं खड़ी हो गयी और मुझे देखने लगी. फ़िर मुझे याद आया कि दरवाजे की सिटकनी मैं लगाना भूल गया था.

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11-03-2012, 04:24 AM
Post: #4
RE: घर का दूध
मैं सकते में आकर रुक गया. अब भी मेरा तन्नाया लंड मेरी मुठ्ठी में था. सोचने लगा कि अब मंजू बाई को क्या कहूंगा! पर मंजू के चेहरे पर शिकन तक नहीं आयी, शायद वो ऐसा मौका कब से ढूंढ रही थी. मेरी ओर देखकर कानों पर हाथ रखकर अचरज का ढोंग करते हुए बोली "हाय बाबूजी ... ये क्या बचपना कर रहे हो ... आप की उमर का नौजवान और .... घर में पराई औरत और आप ये ऐसे ... "

मैं चुप था, उसकी ओर देख कर शरमा कर बस हंस दिया. अखिर मेरी चोरी पकड़ी गयी थी. "वो मंजू बाई ... असल में ... देखो सिटकनी लगाना भी भूल गया मैं ... और तुम भी अच्छी हो ... बिना दस्तक दिये घुस आयीं!"

"अब मैं तो हमेशा पूरे घर में घूमती हूं. तुम्हारा सब काम भी मैं ही करती हूं, ऐसे घर में कहीं जाने के पहले मैं क्यों दरवाजा खटखटाऊंगी? ... आपको ही ये समझना चाहिये कि कब क्या ... " वो मेरी ओर घूरते हुए बोली.

मैं चुप था. मेरी हालत देख कर मंजू ने ताने मारना बंद कर दिया. बोली "अब घर का सारा काम मेरे पे छोड़ा है तो बोलो बाबूजी ये काम भी कर दूं तुम्हारा?"

"अब मंजू बाई ...." मंजू का इशारा मैं समझ गया. पर क्या कहूं ये समझ में नहीं आ रहा था.

मंजू की आंखें चमक उठीं "मेरे नाम से सड़का लगा रहे थे बाबूजी? मैं यहां हूं आपकी हर खातिर करने को फिर भी ऐसा बचपना करते हो! मुझे मालूम है तुम्हारे मन में क्या है. मेरे को कैसे छुप छुप के देखते हो वो क्या मेरे को दिखता नहीं? बोलो बोलो ... साफ़ क्यों नहीं कहते कि मंजू के जोबन पर ललचा गयी तुम्हारी नीयत"

"मंजु बाई ... अब क्या कहूं ... तुम्हारा ये रूप कुछ ऐसा है ..." मैं धीरे से बोला.

"तो खुल के सामने क्यों नहीं आते बाबूजी? बिलकुल अनाड़ी हो आप, इतने दिनों से इशारे कर रही हूं पर फिर भी भागते फिरते हो. और कोई होता तो कब का चढ़ जाता मेरे ऊपर. आप जवान हसीन हो तो मेरा भी जोबन कोई कम नहीं है, समझे?"

मैं चुप रहा. मंजू बाई ने मेरे कपड़े रखे और आकर मेरे पास बैठ गयी "मेरे भोंदू राजा, अब चुपचाप बैठो और मंजू बाई के करतब देखो" मेरा लंड उसने अपने हाथ में लिया और उसे हथेलियों के बीच रगड़ने लगी.

अब तक मैं संभल गया था. उन खुरदरी हथेलियों के रगड़ने से मेरा लंड फ़िर कसके खड़ा हो गया. मैंने मंजू की ओर देखा. उसका ध्यान मेरे लंड पर था. पास से उसका वो मांसल छरहरा बदन देखकर मुझे ऐसा लगा कि मंजू को बांहों में भींच लूं और उस पर चढ़ जाऊं, पर तभी उसने मेरी ओर देखा. मेरे चेहरे के हाव भाव से वो समझ गयी होगी कि मेरे मन में क्या चल रहा है. मैं कुछ करूं, उसके पहले ही उसने अचानक मेरी गोद में सिर झुकाकर मेरा सुपाड़ा मुंह में ले लिया और चूसने लगी. उसके गीले तपते मुंह और मछली सी फ़ुदकती जीभ ने मेरे लंड को ऐसा तड़पाया कि मैं झड़ने को आ गया.

पहले मैं उसको रोकना चाहता था, कम से कम रोकने का नाटक करना चाहता था. पर लंड में जो मस्ती छा गयी थी उसकी वजह से मैं चुप रहा और मजा लेने लगा. सोचा अब जो होगा देखा जायेगा. हाथ बढ़ाकर मैंने उसके मम्मे पकड़ लिये. क्या माल था! सेब से कड़े थे उसके स्तन.

सुपाड़ा चूसते चूसते वह अपनी एक मूठ्ठी में लंड का डंडा पकड़कर सड़का लगा रही थी, बीच में आंखें ऊपर करके मेरी आंखों में देखती और फ़िर चूसने लग जाती. उसकी आंखों में इतनी शैतानी खिलखिला रही थी कि दो मिनिट में मैं हुमक कर झड़ गया. झड़ने के पहले मैंने उसे चेतावनी भी दी "मंजू बाई ... मुंह हटा लो ... मैं गया काम से .... ओह ... ओह " पर उसने तो मेरा लंड और गहरा मुंह में ले लिया और तब तक चूसती रही जब तक मेरा पूरा वीर्य उसके हलक के नीचे नहीं उतर गया.

जब वो मुंह पोछती हुई सीधी हुई तो मैंने हांफ़ते हुए उससे पूछा "कैसी हो तुम बाई, अरे मुंह बाजू में क्यों नहीं किया, मैंने बोला तो था झड़ने के पहले!"

"अरे मैं क्या पगली हूं बाबूजी इतनी मस्त मलाई छोड़ देने को? तुम्हारे जैसा खूबसूरत लौड़ा कहां हम गरीबों को नसीब होता है! ये तो भगवान का परशाद है हमारे लिये" वह बड़ी शोखी से बोली.

उसकी इस अदा पर मैं एकदम फिदा हो गया, रही सही शरम छोड़ कर मैंने उसे बाहों में जकड़ लिया और चूमने की कोशिश करने लगा पर वह छूट कर खड़ी हो गयी और मुस्करा कर बोली "अभी नहीं बाबूजी, बड़े आये अब चूमा चाटी करने वाले. इतने दिन तो कैसे मिट्टी के माधो बने घूमते थे, मैं इशारे करती थी तो मुंह फिरा कर निकल जाते थे, अब चले आये चिपकने. चलो मुझे जाने दो"

"मंजू ... रुक ना थोड़ी देर और ... अरे मेरी तो कब से तमन्ना थी कि तेरे को ऐसे पकड़ूं और चढ़ जाऊं पर ... आखिर मेरी भी तो पहली बार है ना किसी औरत के साथ ..."

"वो पहले कहना था ना बाबूजी. अब मैं नहीं रुकने वाली. वो तो तुमपर तरस आ गया इसलिये सोचा कि कम से कम इस बार तो तुम्हारी तड़प मिटा दूं" कपड़े ठीक करते हुए मंजू बोली. फ़िर मुड़ कर कमरे से निकल गयी.

दरवाजे पर रुक कर मुड़ कर उसने मेरी तरफ़ देखा, मेरे चेहरे के भाव देखकर हंसने लगी "भोंदू के भोंदू ही हो तुम बाबूजी. ऐसे मुंह मत लटकाओ, मैं कोई हमेशा के लिये जा रही हूं क्या? अभी रुकना ठीक नहीं है, दोपहर है, कोई आ जायेगा तो? अब जरा सबर करो, मैं रात को आऊंगी, दस बजे के बाद. देखना कैसी सेवा करूंगी आपकी. अब मुठ्ठ नहीं मारना आपको मेरी कसम!"

मैं तृप्त होकर लुढ़क गया और मेरी आंख लग अयी. विश्वास नहीं हो रहा था कि इस मतवाली औरत ने अभी अभी मेरा लंड चूसा है. सीधा शाम को उठा. मन में खुशी के लड्डू फ़ूट रहे थे. क्या औरत थी! इतना मस्त लंड चूसने वाली और एकदम तीखी कटारी. कमरे के बाहर जाकर देखा तो मंजू गायब थी. अच्छा हुआ क्योंकि जिस मूड में मैं था, उसमें उसे पकड़कर जरूर उसे जबरदस्ती चोद डालता. टाइम पास करने को मैं क्लब में चला गया.

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11-03-2012, 04:24 AM
Post: #5
RE: घर का दूध
जब रात नौ बजे वापस आया तो खाना टेबल पर रखा था. मंजू अब भी गायब थी. मैं समझ गया कि वो अब सीधे सोने के समय ही आयेगी. आखिर उसे भी अहसास होगा कि कोई रात को उसे मेरे घर में देख न ले. दिन की बात और थी. वैसे घर की चाबी उसके पास थी ही. मैं जाकर नहाया और फ़िर खाना खाकर अपने कमरे में गया. अपने सारे कपड़े निकाल दिये और अपने खड़े लंड को पुचकारता हुआ मंजू का इंतजार करने लगा. सारी लाइट्स ऑफ़ कर दीं, बस टेबल लैंप ऑन रहने दिया.

साढ़े दस बजे दरवाजा खोल कर मंजू बाई अंदर आयी. तब तक मेरा लंड सूज कर सोंटा बन गया था. बहुत मीठी तकलीफ़ दे रहा था. मंजू पर झल्लहट हो रही थी कि कहां रह गयी. पर उसको देखकर मेरा लंड और थिरक उठा. उसकी हिम्मत की मैंने मन ही मन दाद दी. मैं यह भी समझ गया कि उसे भी कितनी तेज चुदासी सता रही होगी!

मंजू बाई बाहर के कमरे में सारे कपड़े उतार कर आयी थी. एकदम मादरजात नंगी थी. टेबल लैंप की रोशनी में पहली बार उसका नंगा कसा देसा बदन मैंने देखा. सांवली छरहरी काया, बस जरा सी लटकी हुईं छोटे सेब जैसी ठोस चूचियां, मजबूत जांघें और घनी झांटॊं से भरी बुर, मैं तो पागल सा हो गया. उसके शरीर पर कहीं चर्बी का जरा सा कतरा भी न था, बस एकदम कड़क दुबला पतला सेक्सी शरीर था.

वो मेरी ओर बिना झिझक देख रही थी पर मैं थोड़ा शरमा सा रहा था. पहली बार किसी औरत के सामने मैं नंगा हुआ था और किसी औरत को पूरा नंगा देख रहा था. और वह आखिर उमर में मुझसे काफ़ी बड़ी थी, करीब करीब मेरी मौसी की उमर की.

पर मंजू को जरा शरम नहीं लग रही थी. वो बड़े सहज अंदाज में मटक मटक कर चलती हुई मेरे पास आकर बैठ गयी. मेरा लंड हाथ में पकड़कर बोली "वा बाबूजी, क्या खड़ा है! मेरी याद आ रही थी? ये मंजू बाई पसंद आयी लगता है आपके इस लौड़े को."

अब मुझसे नहीं रहा गया. "तूने तो मुझपर जादू कर दिया है मंजू, साली जादू टोना करती है क्या तू?" कहकर उसे बांहों में भींच कर मैं उसको चूमने लगा. उसके होंठ भी थोड़े खुरदरे थे पर थे एकदम मीठे, उनमें से पान की भीनी खुशबू आ रही थी.

मंजू बोली "हां बाबूजी, ये जादू है औरत मरद का और जवानी का. और मेरा ये जादू अब देखना तुमपे कैसे चढ़ता है" फ़िर अपनी बांहें मेरे गले में डाल कर इतराती हुई वो मेरे चुंबनों का उत्तर देने लगी, मेरे होंठ चूसने के बाद उसने अपनी जीभ से धक्का देकर मेरा मुंह खुलवाया और अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी. मैं उसे चूसने में लग गया. बड़ा मादक चुंबन था, उस नौकरानी का मुंह इतना मीठा होगा, मैंने सोचा भी नहीं था. मेरा लंड अब ऐसा फ़नफ़ना रहा था कि मुझसे रुका नहीं जा रहा था. मैं उसे पटककर उसपर चढ़ने की कोशिश करने लगा.

"अरे क्या भूखे भेड़िये जैसे कर रहे हो बाबूजी, जरा हौले हौले मजा लो, अभी तो बस ऐसे ही चुम्मे लो मंजू बाई के, एकदम मीठे चुम्मे दूंगी मेरे राजा"

बहुत देर हमारी चूमा चाटी चली. मंजू भी मेरा मुंह ऐसे चूस रही थी जैसे सब रस निचोड़ लेना चाहती हो. मेरे हाथ बराबर उसके नंगे बदन पर घूम रहे थे, कभी मम्मे मसलता, कभी पीठ पर हाथ फेरता, कभी जांघें टटोलता और कभी चूतड़ दबाने लगता.

"अब आप आराम से लेटो, मैं करूंगी जो करना है" कहकर उसने मुझे पलंग पर धकेल दिया. मुझे लिटाकर वह फ़िर मेरा लंड चूसने लगी. पहले बस सुपाड़ा चूसा और फ़िर पूरा लंड मुंह में ले लिया. उसकी जीभ मेरे लंड से लिपटी हुई थी. मुझे मजा आ रहा था पर उसे कस के चोदने की इच्छा मुझे शांत नहीं लेटने दे रही थी.

"मंजू बाई, चलो अब चुदवा लो, ऐसे न सताओ. देखो, फ़िर चूस कर नहीं झड़ाना, आज मैं तुझे खूब चोदूंगा" मैंने उसकी एक चूंची हाथ में ले कर कहा. उसका कड़ा निपल कंचे जैसा मेरी हथेली में चुभ रहा था.

उसने हंस कर मुंडी हिलायी कि समझ गयी पर मेरे लंड को उसने नहीं छोड़ा, पूरा जड़ तक निगल लिया और जीभ रगड़ने लगी. शायद फ़िर से मेरी मलाई के पीछे थी यह बिल्ली! मैं तैश में आ गया, यह नहीं मानेगी, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा सोच कर मैं उठा, उसके मुंह से लंड जबरदस्ती बाहर खींचा और उसे बिस्तर पर पटक दिया.

वह कहती रह गयी "अरे रुको बाबूजी, ऐसे नहीं" पर मैंने उसकी टांगें अलग करके अपना लंड उसकी बुर के मुंह पर रखा और पेल दिया. बुर इतनी गीली थी कि लंड आराम से अंदर चला गया. मैं अब रुकने की हालत में नहीं था, एक झटके से मैंने लंड जड़ तक उसकी चूत में उतार दिया और फ़िर उसपर लेट कर उसे चोदने लगा.

मंजू हंसते हुए मुझे दूर करने की कोशिश करने लगी "बाबूजी रुको, ऐसे नहीं चोदो, जरा मजा करके चोदो, मैं कहां भागी जा रही हूं? अरे धीरे बाबूजी, ऐसे जानवर जैसे न धक्के मारो! जरा हौले हौले प्यार करो मेरी बुर को" मैंने उसके मुंह को अपने होंठों में दबा लिया और उसकी बकबक बंद कर दी. फ़िर उसे भींच कर कस के हचक हचक कर उसे चोदने लगा. उसकी चूत इतनी गीली थी कि मेरा लंड सपासप अंदर बाहर हो रहा था. कुछ देर और छूटने की कोशिश करने के बाद मंजू बाई ने हार मान ली और मुझसे चिपटकर अपने चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवाने लगी. अपने पैर उसने मेरी कमर के इर्द गिर्द कस रखे थे और अपनी बांहों में मुझे भींच लिया था.

इतना आनंद हो सकता है चुदाई में मैंने सोचा भी नहीं था. मंजू का मुंह चूसते हुए मैंने उसकी चूत की कुटाई चालू रखी. यह सुख कभी समाप्त न हो ऐसा मुझे लग रहा था. पर मैंने बहुत जल्दी की थी, मंजू बाई की उस मादक देसी काया और उसकी गरमागरम चिपचिपी चूत ने मुझे ऐसा बहकाया कि मैं दो मिनिट में झड़ गया. पड़ा पड़ा मैं इस सुख में डूबा मजा लेता रहा. मंजू बाई बेचारी अब भी गरम थी और नीचे से अपनी चूत को ऊपर नीचे करके चुदाने की कोशिश कर रही थी.

मस्ती उतरने के बाद मुझे अब थोड़ी शरम आई कि बिना मंजू को झड़ाये मैं झड़ गया. कुछ देर पड़ा रहा फ़िर बोला "माफ़ करना मंजू बाई, तुमको झड़ाने के पहले ही मैं बहक गया."

मेरी हालत देखकर मंजूबाई मुझसे चिपटकर मुझे चूमते हुए बोली "कोई बात नहीं मेरे राजा बाबू. आप जैसा गरम नौजवान ऐसे नहीं बहकेगा तो कौन बहकेगा. और मेरे बदन को देखकर ही आप ऐसे मस्त हुए हो ना? मैं तो निहाल हो गयी कि मेरे बाबूजी को ये गांव की औरत इतनी अच्छी लगी. आप मुझसे कितने छोटे हो, पर फ़िर भी आप को मैं भा गयी, पिछले जनम में मैंने जरूर अच्छे करम किये होंगे. चलो, अब भूख मिट गयी ना? अब तो मेरा कहना मानो. आराम से पड़े रहो और मुझे अपना काम करने दो."

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11-03-2012, 04:24 AM
Post: #6
RE: घर का दूध
मंजू के कहने पर मैंने अपना झड़ा लंड वैसे ही मंजू की चूत में रहने दिया और उसपर पड़ा रहा. मुझे बांहों में भरके चूमते हुए वह मुझसे तरह तरह की उकसाने वाली बातें करने लगी "बाबूजी मजा आया? मंजू बाई की चूत कैसी लगी? गांव का माल है बाबूजी, मुलायम है ना? मखमल जैसी चिकनी है या रेशम जैसी? या खुरदरी है? कुछ तो बोलो, शरमाओ नहीं!"

मैंने उसे चूम कर कहा कि दुनिया के किसी भी मखमल या रेशम से ज्यादा मुलायम है उसकी बुर. मेरी तारीफ़ पर वह फ़ूल उठी. आगे पटर पटर करने लगी. "पर मेरी झांटें तो नहीं चुभीं आपके लंड को? बहुत बढ़ गयी हैं और घुंघराली भी हैं, पर मैं क्या करूं, काटने का मन नहीं होता मेरा. वैसे आप कहो तो काट दूं. मुझे बड़ी झांटें अच्छी लगती हैं. और मेरा चुम्मा कैसा लगता है, बताओ ना? मीठा है कि नहीं? मेरी जीभ कैसी है बताओ.

मैंने कहा कि जलेबी जैसी. मैं समझ गया था कि वह तारीफ़ की भूखी है. वह मस्ती से बहक सी गयी. "कितना मीठा बोलते हो, जलेबी जैसी है ना? लो चूसो मेरी जलेबी" और मेरे गाल हाथों में लेकर मेरे मुंह में अपनी जीभ डाल दी. मैंने उस दांतों के बीच पकड़ लिया और चूसने लगा. वह हाथ पैर फ़ेकने लगी. किसी तरह छूट कर बोली "अब इस जलेबी को सच में खा जाओगे क्या? कैसे जालिम हो बाबूजी! अब तुम देखो मैं तुमको कैसे चोदती हूं. अब मेरे पल्ले पड़े हो, रोज इतना चोदूंगी तुमको कि मेरी चूत के गुलाम हो जाओगे"

इन गंदी बातों का असर यह हुआ कि दस मिनिट में मेरा फ़िर खड़ा हो गया और मंजू की चूत में अंदर घुस गया. मैंने फ़िर उसे चोदना शुरू कर दिया पर अब धीरे धीरे और प्यार से मजे ले लेकर. मंजू भी मजे ले लेकर चुदवाती रही पर बीच में अचानक उसने पलटकर मुझे नीचे पटक दिया और मेरे ऊपर आ गयी. ऊपर से उसने मुझे चोदना चालू रखा.

"अब चुपचाप पड़े रहो बाबूजी. आजकी बाकी चुदाई मुझपर छोड़ दो." उसका यह हुक्म मान कर मैं चुपचाप लेट गया. वह उठकर मेरे पेट पर बैठ गयी. मेरा लंड अब भी उसकी चूत में अंदर तक घुसा हुआ था. वह आराम से घुटने मोड़ कर बैठ गयी और ऊपर नीचे होकर मुझे चोदने लगी. ऊपर नीचे होते समय उसके मम्मे उछल रहे थे. उनके बीच उसका काले मणियों वाला सीदा सादा मंगलसूत्र भी इधर उधर डोल रहा था. मैंने हाथ बढ़ाकर उसके स्तन पकड़ लिये और दबाने लगा. उसकी गीली चूत बड़ी आसानी से मेरे लंड पर फ़िसल रही थी. उस मखमली म्यान ने मेरे लंड को ऐसा कड़ा कर दिया जैसे लोहे का डंडा हो.

मंजू मन लगाकर मजा ले लेकर मुझे हौले हौले चोद रही थी. चूत से पानी की धार बह रही थी जिससे मेरा पेट गीला हो गया था. मैंने अपना पूरा जोर लगाकर अपने आप को झड़ने से रोका और कमर ऊपर नीचे करके नीचे से ही मंजू की बुर में लंड पेलता रहा. वह फ़िर मुझे बोली "बाबूजी बोलो ना, मैं कैसी लगती हूं आपको"

मैंने उसकी तारीफ़ के पुल बांध दिये. और झूठे नहीं सच, मंजू बाई अब मुझे अप्सरा जैसी लग रही थी "बाई तुम याने राजा इंद्र के दरबार की अप्सरा हो, उनसे भी अच्छी हो, ऐसा रूप मैंने आज तक नहीं देखा, क्या मम्मे हैं तेरे मंजू, एकदम कश्मीरी सेब जैसे, लगता है खा जाऊं, और ये बुर, मेरे लंड को मार डालेगी आज बाई तेरी ये चूत. और ये तेरा बदन क्या छरहरा है, लगता है बड़े जतन से रखा है अपने इस सोने से जोबन को, ऐसा लगता है जैसे नौजवान छोकरी हो, लगता नहीं कि शादीशुदा औरत हो"

मंजू बाई मेरी तारीफ़ सुन सुनकर और मस्त होती जाती और मुझे चोदती जाती. मेरे हाथ उसने अपनी चूंचियों पर रख लिये थे और दबा रही थी जैसे कह रही हो कि ठीक से मसलो. मैंने उसकी चूंचियां कस के मसलना शुरू कर दिया. आखिर आखिर में तो वो ऐसे बहकी कि जोर जोर से उछलने लगी. मेरा लंड करीब करीब पूरा उसकी बुर के बाहर निकलता और फ़िर सप्प से जड़ तक अंदर घुस जाता. आखिर मंजू बाई एक हल्की सिसकी के साथ झड़ ही गयी.

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11-03-2012, 04:25 AM
Post: #7
RE: घर का दूध
इस वक्त उसकी आंखों में झलक आये सुकून को देखकर मुझे रोमांच हो आया. आखिर मेरे लंड ने पहली बार किसी औरत को इतना सुख दिया था. झड़ कर भी वह ज्यादा देर रुकी नहीं, पांच एक मिनिट मुझे कस कस के चूमती रही और फ़िर सीधी होकर शुरू हो गयी "पड़े रहो बाबूजी, अभी थोड़े छोड़ूंगी तुमको, घंटा भर चोदूंगी, बहुत दिन बाद लंड मिला है और वो भी ऐसा शाही लौड़ा. कितना झूट बोलते हो पर मीठा बोलते हो, अरे मैं कहां की जवान हूं, मेरी तो इतनी बड़ी जवान बेटी है, मैं तुमको पसंद आ गयी ये तो भाग हैं मेरे. और देखो मैं कहूं तब तक झड़ना नहीं, नहीं तो मैं आपकी नौकरी छोड़ दूंगी, फ़िर अकेले में मुठ्ठ मारा करना"

इस मीठी धमकी के बाद मेरी क्या मजाल थी झड़ने की. घंटे भर तो नहीं, पर बीस एक मिनिट मंजू बाई ने मुझे खूब चोदा, अपनी सारी हवस पूरी कर ली. चोदने में वह बड़ी उस्ताद निकली, मुझे बराबर मीठी छुरी से हलाल करती रही, अगर मैं झड़ने के करीब आता तो रुक जाती. मुझे और मस्त करने को वह बीच बीच में खुद ही अपनी चूंचियां मसलने लगती. कहती "चूसोगे बाबूजी? कश्मीरी सेब खाओगे?" और खुद ही झुक कर अपनी चूंची खींच कर निपल चूसने लगती. मैं उठकर उसकी चूंची मुंह में लेने की कोशिश करता तो हंस कर मुझे वापस पलंग पर धकेल देती. तरसा रही थी मुझे!

दो बार झड़ने के बाद वह मुझ पर तरस खाकर रुकी. अब मैं वासना से तड़प रहा था. मुझसे सांस भी नहीं ली जा रही थी.

"चलो पीछे खिसककर सीधे हो कर बैठ जाओ बाबूजी, तुम बड़े अच्छे सैंया हो, मेरी बात मानते हो, अब इनाम दूंगी" मैं सरका और पीछे सिरहाने से टिक कर बैठ गया. अब वह मेरी ओर मुंह करके मेरी गोद में बैठी थी. मेरा उछलता लंड अब भी उसकी चूत में कैद था. वह ऊपर होने के कारण उसकी छाती मेरे मुंह के सामने थी. पास से उसके सेब से मम्मे देखकर मजा आ गया. किसमिस के दानों जैसे छोटे निपल थे उसके और तन कर खड़े थे. मंजू मेरे लाड़ करते हुए बोले "मुंह खोलो बाबूजी, अपनी मंजू अम्मा का दूध पियो. दूध है तो नहीं मेरी चूंची में, झूट मूट का ही पियो, मुझे मजा आता है"

मेरे मुंह में एक घुंडी देकर उसने मेरे सिर को अपनी छाती पर भींच लिया और मुझे जोर जोर से चोदने लगी. उसकी आधी चूंची मेरे मुंह में समा गयी थी. उसे चूसते हुए मैंने भी नीचे से उचक उचक कर चोदना शुरू कर दिया, बहुत देर का मैं इस छुरी की धार पर था, जल्द ही झड़ गया.

पड़ा पड़ा मंजू की चूंची चूसता हुआ मैं इस मस्त स्खलन का लुत्फ़ लेने लगा. मेरे पूरे झड़ने तक मंजू रुकी और प्यार से मेरे माथे को चूमती रही. आखिर जब मैं संभला तो मंजू ने मेरे लंड को अपनी चूत से निकाला और उठ बैठी. एक तौलिये से उसने मेरा लंड और अपनी बुर पोछी. फ़िर मुझे प्यार भरा एक चुम्मा देकर जाने के लिये उठने लगी. उसकी आंखों में असीम प्यार और तृप्ति की भावना थी. मैं उसका हाथ पकड़कर बोला. "अब कहां जाती हो मंजू बाई, यहीं सो जाओ मेरे पास, अभी तो रात बाकी है"

वह हाथ छुड़ाकर बोली "नहीं बाबूजी, मैं कोई आपकी लुगाई थोड़े ही हूं, कोई देख लेगा तो आफ़त हो जायेगी. कुछ दिन देखूंगी. अगर किसी को पता नहीं चला तो आप के साथ रात भर सोया करूंगी"

मुझे पक्का यकीन था कि इस कॉलोनी में जहां दिन में भी कोई नहीं होता था, रात को कोई देखने वाला कहां होगा! और उसका घर भी तो भी मेरे बंगले से लगा हुआ था. पर वह थोड़ी घबरा रही थी इसलिये अभी मैंने उसे जाने दिया.

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11-03-2012, 07:09 AM
Post: #8
RE: घर का दूध
दूसरे दिन से मेरा कामजीवन ऐसे निखर गया जैसे खुद भगवान कामदेव की मुझ पर कृपा हो. मंजू सुबह सुबह चाय बनाकर मेरे बेडरूम में लाती और मुझे जगाती. जब तक मैं चाय पीता, वह मेरा लंड चूस लेती. मेरा लंड सुबह तन कर खड़ा रहता था और झड़ कर मुझे बहुत अच्छा लगता था. फ़िर नहा धोकर नाश्ता करके मैं आफ़िस को चला जाता.

दोपहर को जब मैं घर आता तो मंजू एकदम तैयार रहती थी. उसे बेडरूम में ले जाकर मैं फ़टाफ़ट दस मिनिट में चोद डालता. कपड़े उतारने का समय नहीं रहता था, बस अपनी ज़िप से लंड निकालता और उसकी साड़ी ऊपर करके पेल देता. कभी कभी उसे खड़े खड़े चोद देता, दीवार से सटा कर, पलंग पर भी नहीं लिटाता. वह भी ऐसी गरम रहती थी कि तुरंत झड़ जाती थी. इस जल्दबाजी की चुदाई का आनंद ही कुछ और था. अब मुझे पता चला कि ’क्विकी’ किस चीज़ का नाम है. चुदने के बाद वह मुझे खुद अपने हाथों से प्यार से खाना खिलाती, एक बच्चे जैसे. मैं फ़िर आफ़िस को निकल जाता.

शाम को हम जरा सावधानी बरतते थे. मुझे क्लब जाना पड़ता था. कोई मिलने भी अक्सर घर आ जाता था. इसलिये शाम को मंजू बस किचन में ही रहती या बाहर चली जाती. पर रात को दस बजे मैं उसे लेकर लेट जाता, ऐसी धुआंधार चुदाई होती कि दिन की सारी कसर पूरी हो जाती. सोने को तो रात के बारा बज जाते. अब वह मेरे साथ ही सोती थी. एक हफ़्ता हो गया था और रात को माहौल इतना सुनसान होता था कि किसी को कुछ पता चलने का सवाल ही नहीं था. वीक एंड में शुक्रवार और शनिवार रात तो मैं उसे रात भर चोदता, तीन चार बज जाते सोने को.

मैंने उसकी तनखा भी बढ़ा दी थी. अब मैं उसे हजार रुपये तनखा देता था. पहले वह नहीं मान रही थी. जरा नाराज होकर बोली "ये मैं पैसे को थोड़े करती हूं बाबूजी, तुम मुझे अच्छे लगते हो इसलिये करती हूं. रंडी थोड़े हूं, तेरी सजनी हूं" पर मैंने जबरदस्ती की तो मान गयी. इसके बाद वह बहुत खुश रहती थी. मुझे लगता है कि उसकी वह खुशी पैसे के कारण नहीं बल्कि इसलिये थी कि उसे चोदने को मेरे जैसा नौजवान मिल गया था, करीब करीब उसके बेटे की उमर का.

मंजू को मैं कई आसनों में चोदता था पर उसकी पसंद का आसन था मुझे कुरसी में बिठाकर मेरे ऊपर बैठ कर अपनी चूंची मुझसे चुसवाते हुए मुझे चोदना. मुझे कुरसी में बिठाकर वह मेरा लंड अपनी चूत में लेकर मेरी ओर मुंह करके मेरी गोद में बैठ जाती. फ़िर मेरे गले में बांहें डाल कर मुझे अपनी छाती से चिपटाकर चोदती. उसकी चूंची मैं इस आसन में आराम से चूस सकता था और वह भी मुझे ऊपर से मन चाहे जितनी देर चोद सकती थी क्योंकि मेरा झड़ना उसके हाथ में था. उसके कड़े निपल मुंह में लेकर मैं मदहोश हो जाता. उसके स्तन और निपल बहुत सेंसिटिव थे, उन्हें चुसवाने में उसे बड़ा आनंद आता था.

शनिवार रविवार को बहुत मजा आता था. मेरी छुट्टी होने से मैं घर में ही रहता था इसलिये मौका देखकर कभी भी उससे चिपट जाता था और खूब चूमता और उसके मम्मे दबाता. जब वह किचन में खाना बनाती थी तो उसके पीछे खड़े होकर मैं उससे चिपट कर उसके मम्मे दबाता हुआ उसकी गर्दन और कंधे चूमता.

उसे इससे गुदगुदी होती थी और वह खूब हंसती और मुझे दूर करने की झूठी कोशिश करती "हटो बाबूजी, क्या लपर लपर कर रहे हो कुत्तों जैसे, मुझे अपना काम करने दो" तब मैं उसके मुंह को अपने मुंह से बंद कर देता. मेरा लंड उसके साड़ी के ऊपर से ही चूतड़ों के बीच की खाई में समा जाता और उसे उसकी गांड पर रगड़ रगड़ कर मैं खूब मजा लेता. कभी मौका मिलता तो दिन में ही बेडरूम में ले जाकर फ़टाफ़ट चोद डालता था.

धीरे धीरे मेरे दिमाग में उसके उन मस्त चूतड़ों को चोदने का खयाल आने लगा. उसके चूतड़ थे तो छोटे पर एकदम गोल और कड़े थे. चोदते समय मैं कई बार उन्हें पकड़कर दबाता था. इसपर वह कुछ नहीं कहती थी पर एकाध बार जब मैंने उसकी गांड में उंगली करने की कोशिश की तो बिचक गयी. उसे वह अच्छा नहीं लगता था.

कब उसकी गांड मारने को मिलती है इस खयाल से मैं पागल सा हो गया था. वह चुदैल औरत भी शायद जानती थी कि मैं कैसे उसकी गांड को ललचाकर देखता हूं. इसलिये मेरे सामने जान बूझकर वह मटक मटक कर चूतड़ हिलाकर चलती थी. जब उसकी लहराती गांड देखता तो लगता था कि अभी पटककर उस छिनाल के चूतड़ों के बीच अपना लौड़ा गाड़ दूं.

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11-03-2012, 07:10 AM
Post: #9
RE: घर का दूध
एक दिन मैंने हिम्मत करके उससे कह ही डाला "मंजू बाई, तुम्हारा बदन याने महल है महल, ताजमहल कह लो. इस घर में आकर लंड को वो सुकून मिलता है कि क्या कहूं"

"फ़िर लंड को हमेशा इस घर में ही रखा करो बाबूजी, निकाला ही मत करो" वो मुझे चूम कर बोली.

"पर इस महल के सब कमरे कहां दिखाये तुमने मंजू बाई? मैंने तो सामने वाला कमरा देखा है, आगे वाले दरवाजे से अंदर आकर तबियत खुश हो जाती है. पर अपने घर के पीछे वाले कमरे की भी सैर कराओ ना मंजू बाई"

"क्या बदमाशी की बात कर रहे हो बाबूजी" मंजू मुंह बना कर बोली "मैं समझी नहीं, जरा समझाओ ना क्या कह रहे हो"

उसके चूतड़ दबा कर मैं बोला "ये जो पीछे वाला गोल मटोल कमरा है ना, उसमें तो जरा घुसने दे ना मंजू, अपने महल के पिछले दरवाजे से"

वो आंख दिखा कर बोली "वा बाबूजी, बड़े शैतान हो, सीधे क्यों नहीं कहते कि मेरी गांड मारना चाहते हो. बोलो, यही बात है ना?" मैंने जब थोड़ा सकुचा कर हामी भरी तो तुनककर बोली "मैं क्यों अपनी गांड मरवाऊं, मेरा क्या फ़ायदा उसमें? और दर्द होगा वो अलग!"

मैंने मिन्नत की पर वो मुकर गयी. मैं सोचने लगा कि कैसे इसे राजी करूं.

दो दिन बाद मैंने हिचकते हुए उसकी तनखा दूनी कर देने की बात की. वो बोली "काहे को बढ़ा रहे हो तनखा? मैंने कहा तुमको?"

"नहीं मंजू पर उस दिन तुम बोल रही थी कि गांड मरवा कर मेरा क्या फायदा होगा तो मैंने सोचा ..."

पता चला कि वो पैसे के फ़ायदे के बारे में नहीं कह रही थी. मेरी बात पर बेहद नाराज हो गयी. मुझसे दूर होकर चिढ़ कर बोली "मुझे रंडी समझा है क्या बाबूजी? कि पैसे देकर गांड मार लोगे?"

उसके बाद उसने मुझे बदन को हाथ तक नहीं लगाने दिया. मैं पास लेना चाहता या चुम्मा लेने को जाता तो छूट कर अलग हो जाती. मुझसे बोलना भी बंद कर दिया. उसे समझाने बुझाने में मुझे पूरे दो दिन लग गये. बिलकुल रूठी हुई प्रेमिका जैसे उस मनाना पड़ा तब उसका गुस्सा उतरा.

मुझे समझ में नहीं आता था कि कैसे उसे मनाऊं गांड मारने देने को. उसके वो गोल मटोल चूतड़ मुझे पागल कर देते थे. आठ दस दिन तो मैं चुप रहा पर एक बार जब वो मुझे ऊपर से चोद रही थी तब उसकी कमर पकड़कर मैंने बहुत मिन्नत की. मुझे डर लग रहा था कि चोदना बंद करके भाग तो नहीं जायेगी पर उस दिन उसका मूड अच्छा था. उछल उछल कर मुझको चोदती हुई बोली "तुम्हारा इतना मन है तो देखती हूं बाबूजी, कोई रास्ता निकलता है क्या. पर बड़े अपने आप को मेरा सैंया कहते हो! मुझे कितना प्यार करते हो ये तो दिखाओ. मेरी ये रसीली चूत कितनी अच्छी लगती है तुम्हें ये साबित करो. मुझे खुश करो मेरे राजा बाबू तो मैं शायद मारने दूंगी अपनी गांड तुमको. असल में बाबू मेरी गांड का छेद छोटा है, दुखता है, आज तक मैंने अपने उस नालायक आदमी को भी नहीं मारने दी, वैसे मेरे सैंया के लिये मैं कुछ भी कर लूंगी, पर मेरा सच्चा सैंया बन कर तो दिखाओ"

"अब कैसे तेरा सैंया और बनूं मंजू, तेरी गुलाम तो हो गया हूं, तेरे इशारे पर नाचता हूं, और क्या करूं, तू बता ना"

"वो मैं नहीं बोलूंगी, बोल कर करोगे तो क्या फायदा. खुद ही साबित करो कि मेरी पे पागल हो"

मैंने बहुत पूछा पर उसने यह नहीं बताया कि मैं कैसे उसे खुश करूं. मैं चोदता तो था उसे मन भर के, जैसा वो कहती वैसा चोदता था. पर वो और कुछ खुलासा नहीं करती थी कि उसके मन में क्या है.

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11-03-2012, 07:10 AM
Post: #10
RE: घर का दूध
एक रात मैं मंजू को गोद में बिठाकर उसे चूमते हुए एक हाथ से उसके मम्मे मसल रहा था और एक हाथ से उसकी घनी झांटों में उंगली डाल कर उसकी बुर सहला रहा था. ऐसा मैं अक्सर करता था, बड़ा मजा आता था, मंजू के मीठे मीठे चुम्मे, उसका कड़क बदन मेरी बांहों में और उंगली उसकी घुंघराले घने बालों से भरी बुर में.

उस दिन मैं उसकी चूत में उंगली डालकर उसे हस्तमैथुन करा रहा था. मैंने उसे सहज पूछा था कि जब मेरा लंड नहीं था तो कैसे अपनी चुदासी दूर करती थी तो हंस कर बोली "ये हाथ किस लिये है बाबूजी? गांव की छोरी से पूछते हो कि अकेले में क्या करती है? तुम क्या करते हो लंड के साथ जब चूत नहीं होती?"

"याने तुम भी मुठ्ठ मारती हो मंजू? मेरे को करके दिखाओ ना. प्लीज़ मंजू बाई"

"अब तुम्हारा लंड है मेरी खुजली दूर करने को तो मैं क्यों मुठ्ठ मारूं"

मैंए जब बार बार कहा तो आखिर वो मान गयी. मेरी गोद में बैठे बैठे ही अपनी उंगली से अपनी मुठ्ठ मार कर दिखायी.

सामने के आइने में मुझे साफ़ दिख रहा था, मंजू अंगूठे और एक उंगली से अपनी झांटें बाजू में करके बीच की उंगली बड़े प्यार से अपनी बुर की लकीर में चला कर अपना क्लिटोरिस रगड़ रही थी और बीच बीच में वह उस उंगली को अंदर घुसेड़कर अंदर बाहर करने लगती थी. उसका हस्तमैथुन देखकर मैं ऐसा गरम हुआ कि तभी उसे चोद डालना चाहता था.

पर वो बोली "अब मुठ्ठ मारने पे आये हो ना? तो तुम भी मेरी मुठ्ठ मारो." उसने जिद ही पकड़ ली. मैंने अपनी उंगली उसकी बुर में डाल दी. वह मुझे सिखाने लगी कि कैसे औरत की चूत को उंगली से चोदा जाता है.

पहली बार मुझे अहसास हुआ कि बुर क्या चीज है, वह मखमली नली छू कर कैसी लगती है और क्लिटोरिस कैसा कड़ा मके के दाने जैसा लगता है. मंजू का तो खास कर एकदम कड़ा हीरे जैसा था. उसपर उंगली रगड़ता तो वह ऐसे बिचकती कि मुझे मजा आ जाता. फ़िर उसने मुझे दो उंगली से मुठ्ठ मारना सिखाया, कैसे दो उंगलियां चूत में डालना चाहिये कि क्लिट उनके बीच पकड़ में हो और कैसे उंगलियां चूत में अंदर बाहर करते हुए साथ में क्लिट को भी लगातार उनमें दबाते हैं. मैं जल्द सीख गया और फ़िर मंजू बाई की ठीक से मुठ्ठ मार दी.

जब वह झड़ गयी तो मैंने उंगलियां बाहर निकाली. उनपर सफ़ेद चिपचिपा रस लगा था. मैंने सहज ही उनको नाक के पास ले जाकर सूंघा. बहुत सौंधी मसालेदार गंध आ रही थी. मेरी यह हरकत देखकर वह इतरा कर बोली "असली घी है मेरे राजा, खोबा है खोबा!" उसकी चमकती आंखों में एक अजीब कामुकता थी. मुझे देखते देखते उसने एक बार अपने होंठों पर अपनी जीभ भी फिरा दी. मैं उसके होंठ चूमने लगा.

अचानक मेरे दिमाग में बिजली सी कौंध गयी कि उसके मन में क्या है. इतने दिनों की चुदाई में वह बेचारी रोज मेरा लंड चूसती थी, मेरा वीर्य पीती थी पर मैंने एक दिन भी उसकी चूत को मुंह नहीं लगाया था. वैसे उसकी रिसती लाल चूत देखकर कई बार मेरे मन में ये बात आयी थी पर मन नहीं मानता था. थोड़ी घिन लगती थी कि इस नौकरानी की चूत ठीक से साफ़ की हुई होगी कि नहीं. वैसे वह बेचारी दिन में दो बार नहाती थी पर फ़िर भी मैंने कभी उसकी चूत में मुंह नहीं डाला था.

आज उसकी उस रिसती बुर को देखकर मेरा मन हुआ कि उसकी बुर चूस कर देखूं. गंध इतनी मसालेदार थी तो स्वाद कैसा होगा!

मेरा लंड तन कर खड़ा था. मैंने मंजू की आंखों में आंखें डालीं और अपना मुंह खोलकर दोनों उंगलियां मुंह में लेकर चूसने लगा. मेरी सारी हिचक दूर हो गयी. बहुत मस्त खारा सा स्वाद था. मंजू मेरी गोद में बिलकुल चुप बैठी मेरी ओर देख रही थी. उसकी सांस अब तेज चल रही थी. एक अनकही वासना उसकी आंखों में उमड़ आयी थी. मुझे उंगलियां चाटते देख कर बोली "कैसा है खोबा बाबूजी?"

मैं उंगलियां जीभ से साफ़ करके बोला "मंजू बाई, एकदम देसी घी है, तू सच कहती थी. तेरी बुर में तो लगता है खजाना है शहद का. चलो चटवाओ, टांगें खोलो और लेट जाओ. मैं भी तो चाट कर देखूं कि कितना रस निकलता है तेरी चूत में से"

यह सुनकर वह कुछ देर ऐसे बैठी रही जैसे मेरी बात पर उसे यकीन न हो रहा हो. मैंने फ़िर बुर में उंगली डाली और उंगली पर लेकर रस चाटने लगा. तीन चार बार ऐसा करने पर जब उसने समझ लिया कि मैं पूरे दिल से यह बात कह रहा हुं तो बिना कुछ कहे मेरी गोद से वह उठ कर बाहर चली गयी. मुझे समझ में नहीं आया कि इसे क्या हुआ. दो मिनिट बाद वापस आयी तो हाथ में नारियल के तेल की शीशी लेकर.

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