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परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
09-04-2012, 12:55 AM
Post: #31
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
उदिता बोली...’मोहम्मद भाई आपके खास मेहमान तो हमारे अति खास मेहमान. अब देखिये कैसी खिदमत होगी अभि जी की.’.....ये कहते हुए वो मेरे गले लगी और अपने होंठ मेरे होंठों से मिला दिए.

मैं तो जैसे अपने आप में ही नहीं था. उदिता के होंठ से उसका रस चूसने लगा.

फिर वो मुझे अपने भव्य ऑफिस में ले गया.

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अब आगे.......
=========

ऑफिस की सजावट देखते ही बनती थी. कुछ ही देर में उदिता बोलीवुड से आई छ: और सुंदरियों के साथ ऑफिस में प्रविष्ठ हुई. सभी एक छोटे से टॉप और स्किर्ट में थी.

सभी आकर मोहम्मद की आलिशान कुर्सी के आसपास खड़ी हो गई और मुझे कौतुहल से देखने लगी.

‘इनसे मिलो, ये मेरे एकदम खास मेहमान और छोटे भाई जैसे हैं. तुम सबको इनका खास ख्याल रखना है.’...........मोहम्मद उन सब से बोला.

‘मोहम्मद भाई, आप जरा भी फ़िकर न करें. खुदा कसम आज इन्हें हम जन्नत की सैर करा देंगे.

वैसे भाईजान, ये भी माशाल्लाह, किसी हीरो से कम नहीं हैं.........मज़ा आएगा.’.........वीना मलिक पीछे से चहकते हुए मेरे पास आकर बोली.

फिर उसने मुझे बाँहों में भरते हुए मस्त चुम्मा दिया. वीना को अपनी बाँहों में पाकर मैं बहुत उत्तेजना से भर गया और उसके भारी नितम्बों को हाथ में भरकर जोर से दबा दिया.

‘चलिए आप सब भी बारी बारी से हमारे दोस्त से परिचय कीजिये.’...........मोहम्मद अब बाकी सब से मुखातिब होते हुए बोला.

वीना हटी तो उसके ठीक पीछे से मेघना नायडू बाहें फैलाये मेरी ओर बड़ी.

पहले होंठों का चुम्मा लिया ओर फिर उसने अपने मम्मे मेरे सीने में घुसा कर उन्हें थोड़ा मसला. मैं उसके शरीर पर जहाँ भी हाथ गया उसे सहलाता चला गया.

फिर आई याना गुप्ता. बिलकुल फ्रेंच गुड़िया जैसी लग रही थी. हालांकि चेहरा उसका भावहीन था फिर भी मुझे बड़ी गर्मजोशी से किस करने लगी.

उसे तो मैंने बाँहों में भरकर लगभग उठा ही लिया. मेरा पप्पू एकदम तन चुका था. वो याना की योनी पर एकदम गुचा.

वो 'ओउच' करते हुए नीचे उतरी और मुझे एक मुक्का मारते हुए बोली ‘यू नोटी’ और फिर अपनी योनी सहलाती हुई पीछे चली गई.

मेरा पप्पू एकदम नब्बे डिग्री पर सर उठाये पेंट को तम्बू बनाने की कोशिश में लगा हुआ था.

मैं उसे ऊपर से ही सेट करने का प्रयास करने लगा तभी शेफाली ज़रीवाला आगे आई और उसने मेरे बेल्ट को ढीला करके ट्राउसर का बटन खोला और अपना हाथ मेरे क्रोच में घुसा दिया.

फिर पप्पू को थामा और थोड़ी कोशिश के बाद ऊपर की ओर कर दिया. मेरे पप्पू पर ऐसी सरसराहट हुई कि जैसे कि कोई ....‘काँटा लगा....... हाय लगा’.

जैसे ही उसने मुट्ठी में थामा तो सहज ही बोल पड़ी ‘हाय रे एकदम मस्त हथियार है हमारे भाईजान के दोस्त का तो.’

ये सुनते है सारी की सारी खिलखिला के हँस पड़ी. मोहम्मद भी मुस्कुराये बिना नहीं रह पाया. मेरे कान थोड़े से लाल हो गए.

अबके शेफाली ने अपनी क्रोच मेरे हथियार पर रखी और उसे मसलते मसलते मेरे हाथ उसके मोम्मों पर रखवा लिए.

मैं उन्हें मसलने लगा. फिर उसने अपना मुंह मेरे मुंह में दिया और अपनी लार मेरे मुंह में ट्रांसफर करने लगी.

उसके मुंह और सांस से बड़ी ही अच्छी खुशबू आ रही थी. मेरे पूरे होंठ गीले हो गए.

उसके हट्ते ही पूनम पांडे सामने आ गई. एकदम छम्मक छल्लो लग रही थी.

वो मेरी आँखों में देखे जा रही थी. मैंने उसके बब्बू थामे तो वो उन्हें छुड़ा कर नीचे बैठ गई और पेंट के ऊपर से ही मेरे कड़कभम पप्पू पर अपने गाल और होंठ फिराने लगी.

बीच बीच में पप्पू को हाथ से दबा भी रही थी. फिर उठी और मेरा चुम्मा लिया और फिर निशा कोठारी के लिए जगह बना दी.

उसने भी थोड़ा चूमा-चाटी और मसला-मसली की और फिर वे सब मोहम्मद की कुर्सी के आसपास खड़ी हो गई.

सबने मुझे छेड़ना शुरू कर दिया. कोई मुझे आँख मार रही थी तो कोई फ़्लाइंग किस दे रही थी. वीना अपने दोनों मम्मो को पकड़ कर मेरी ओर बढ़ाने लगी.

इन सबसे बाज़ी मारते हुए पूनम ने अपने दोनों मम्में बाहर निकाल लिए और उन्हें मसलते हुए मुझे आमंत्रित सी करने लगी.

फिर अचानक उसने अपना एक मम्मा मोहम्मद के मुंह पर लटका दिया. मोहम्मद ने उसे अपने मुंह में भर लिया. वो अभी भी मेरी आँखों में देखे जा रही थी.

मेरा पप्पू दोलन करने लगा. मैंने ज़िप खोलकर जोकी को खींचा और पप्पू को थोड़ी जगह दी.

तभी उदिता बोल पड़ी........’अरे अभि जरा नीचे तो खिसकाओ. यार हम भी तो देखे के आखिर क्या छुपा रखा है.’

मैं शरम के मारे ये न कर पाया तो वो निकल कर मेरे पास आ गई और एक झटके से पेंट और जॉकी घुटनों तक खींच दी.

मेरा पप्पू झटके से हवा में झूल कर हिलने लगा. उसे देख कर सबकी सब जोर से चिल्लाई और आ आ करने लगी.

उदिता ने तो उसे अपनी मुट्ठी में ही भर लिया और उससे खेलने लगी. फिर उसे अपने मुंह के हवाले कर दिया और उसे चूसने लगी.

‘उदिता, पूरा मुंह में ले के दिखा तो जाने’............ये वीना की आवाज़ थी.

उदिता ने उसे गले तक निगल लिया फिर भी पूरा अंदर नहीं जा पा रहा था. उसने खांसते हुए उसे बाहर निकाला और असहाय दृष्टि से वीना की ओर देखा.

तभी मोहम्मद भाई कुर्सी से उठते हुए बोले ......‘चलो भाई, मेरा दोस्त अब तुम सबके हवाले. अभि बिरादर, कैसा लग रहा है.......कम्फर्टेबल ना.’.......

‘अरे भाईजान, इन सभी को मैं एकदम अच्छे से जानता हूं. भयंकर मज़ा आ रहा है........शुक्रिया भाईजान.’.......मैं बोला.

तभी उदिता ने मेरे पप्पू को छोड़ा और बोली.....’मोहम्मद भाई ये तो अभी शुरुवात भर है........अब देखना तो है कि आपके दोस्त में कितना दम है.’

‘अरे उदिता, इतना इतरा मत. मुझे तो मेरे दोस्त में बहुत दम नज़र आ रहा है.........देखना...... अकेला भारी ना पड़ जाये तुम सब पर.’.............

और ये कहते हुए मोहम्मद भाई वहाँ से रवाना हो गए.

तभी जाते जाते वो मुझसे बोले..........’बिरादर, अभी एक और भारतीय सुन्दरी बाकी है..........पहले तो तुम इन सब से निपटो.’

उनके जाते ही वीना बोली....’अभिसार जी, आप हमारे प्रिंस हैं और हम सब मिलकर आपको शाही ट्रीटमेंट देंगी.

चलिए सबसे पहले आपका शाही स्नान हो जाये.’

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09-04-2012, 12:55 AM
Post: #32
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
उदिता ने मेरा पेंट ऊपर कर दिया. हम सभी बाहर आ गये और शाही गुसलखाने की ओर बढ़ चले.

बड़ा ही लक्ज़री और भव्य बाथरूम था वो.

बीचोबीच एक छोटा सा तरणताल था जिसमे उतरने के लिए ५-६ सीढ़ियाँ थी और कमर तक का पानी भरा था.

उसमें आलरेडी एक रशियन और एक लेटिना पहले से ही मौजूद थी.

वहाँ पहुँचते ही सभी ने मेरे कपड़े खींच खींच कर मुझे नंगा कर दिया. फिर सातों सुंदरियों ने मुझे उठा लिया और पानी में उतरने लगी.

वीना ने अपने दोनों हाथ मेरे पुट्ठों के नीचे लगाये थे तो मेरा पप्पू उसके मुँह के एकदम पास था. उसने तो वहीँ गप्प कर लिया.

पानी में पहुँच कर मुझे खड़ा कर दिया और सभी मेरे सामने आ गई. केवड़ा और गुलाब जल युक्त ठन्डे पानी में गुलाब, मोगरे, चमेली और ना जाने कितने किस्म के फूल तैर रहे थे.

बहुत ही मस्ताना माहौल था. मैं सोचने लगा कि कहाँ तो इन सुंदरियों की एक भी झलक नसीब में नहीं थी और आज..........आज इतनी सारी एक साथ!

इन सभी के साथ तो सेक्स करना मुश्किल है फिर भी सभी का स्वाद तो लेना ही है. मुझे अपने पर विश्वास था कि आखिर तक मैं अपने आप को रोके रखूँगा.

तभी वीना बोली...........’हाँ अभिसार जी, थोड़ी सी जहमत उठानी पड़ेगी आपको. आप तो एकदम नंगे हो चुकें है पर हमारे कपड़े अभी भी तन पर मौजूद है. तो आप ही इन्हें............’

अरे वाह तो इसका मतलब मुझे इन सबको नंगा करना है............

सबसे पहले वीना को ही पकड़ा और उसके बब्बुओं की सुरक्षा कवच कंचुकी की गठान को पीछे से खोला और फिर एक ही झटके में उसके भरे-पूरे उभारों का अनावरण कर दिया.

दोनों कबूतर मस्ती में झूम उठे.

फिर एक हाथ पानी में नीचे डाला. और स्किर्ट के अंदर हाथ घुसाते हुए उसकी छोटी से कच्छी को एक झटके में नीचे खींच दिया.

फिर स्किर्ट का हुक खोल कर उसे भी खोल दिया. बाकी का काम उसने खुद कर लिया.

इसी तरह एक एक करके सभी बोलीवुड योवनाओं के कोमलांगो को उघाड़ता चला गया.

फिर मेरा ध्यान उन रशियन और लेटिना पर गया. इशारे से उन्हें अपने पास बुलाया. रुसी बिलकुल शारापोवा लग रही थी और वो लेटिना बिलकुल शकीरा जैसी.

मैंने पहले उस रूसी को नंगा किया और फिर उसके एकदम संगमरमरी बदन को बाँहों में भरकर उसके होंठों को चूसने लगा.

वो अपना बदन मेरे बदन पर फिसलाने लगी थी. इतनी तेज़ उत्तेज़ना की लहर उठ रही थी की बता नहीं सकता.

कुछ देर बाद उस लेटिना को लपेटा. बहुत ही गुदाज़ मगर बड़ी ही ठोस थी. लपेटे लपेटे ही उसका चीर हरण करने लगा.

वो बहुत ही जंगली बिल्ली जैसे मेरे होंठ चूस रही थी. आह, क्या बॉडी दी है भगवान ने इसको.......मौका मिला तो इसकी तो जरूर लूँगा.

मैं तो उसके बदन को छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था.

तभी वीना आई और मुझे उससे अलग किया........

’अरे अरे........अभिसार जी.......अभी तो देसी माल का मज़ा लो...........इस से मुकाबला बाद में करना......छटी का दूध याद दिला देगी ये फिरंगी तो.’

अब सबने मिलकर मोर्चा संभल लिया. वे सब चारों ओर से अपने उभारों को मेरे शरीर पर मलने लगी.

कई जोड़ी चूच्चे मेरी त्वचा में चुभ चुभ कर तरंगे उठा रहे थे. मैं एकसाथ इतनी सारी बॉलीवुड की नग्न हस्तियों के साथ नवाबी अंदाज़ में जल-क्रीडा कर रहा था.

मेरे शरीर के हर हिस्सों पर उन सबों ने मिलकर अपने नुकीले चुच्चों से खरोंचे मारी. गोल गोल उभारों ने ऐसी मसाज की कि इसके सामने थाई मसाज भी एकदम फेल.

कुछ ही देर में मुझ पर मस्ती तारी होने लगी.

चलो अब एक एक करके सभी का अलग अलग स्वाद लिया जाया. हम्म........पहले किसको चखूँ.............हाँ उदिता से शुरुवात करता हूं.

मैंने उदिता की ओर रुख किया और उसकी पीठ से जा लगा. अपने पप्पू को उसके पीछे रगड़ने लगा.

दोनों हाथों से उसके मम्मे थामे और उन्हें मसलते हुए गर्दन पर चुप्पा चापी करने लगा.

कुछ देर मसला मसली का मज़ा लेने के बाद उसे घुमाया और गोद में लेते हुए अपने पेट पर चढ़ा लिया.

उसने अपने दोनों पैर मेरी कमर में लपेट दिए और अपनी बाहें मेरी गर्दन में.

बाकी सबने उसका वजन सँभालने के लिए उसकी कमर और नितम्बों को थाम लिया.

और फिर किसी ने मेरे पप्पू को अपने नाज़ुक हाथ में भरते हुए उसके योनिछिद्र पर टिकाया और उसे दबाते हुए पप्पू की उसके मोहल्ले में एंट्री करवा दी.

मैंने उसके मम्मों को अपनी छाती से चिपटाया और मुंह में मुंह डाल दिया.

अब सब हसीनाएं उसे उठा उठा कर मेरे पप्पू पर पेलने लगी.

लगभग एक मिनट मैं उसे रंभाता रहा और उसे मसल मसल कर भोगने के बाद फिर अपने मूसल पर से नीचे उतार दिया.
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09-04-2012, 12:55 AM
Post: #33
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
अब मैं शेफाली के मम्मो पर टूट पड़ा. काफी भरे पूरे थे. बहुत मज़ा आया.

और जब सबने उसे उठा कर उसे मेरे पप्पू पर पेला तो उसकी दरार में अलग ही मज़ा महसूस हुआ.

बहुत ही तंग दरार लगी जैसे कि वो कच्ची कलि हो. बहुत ही झूम झूम कर मज़े देने लगी.

उसे उतारने की इच्छा तो नहीं हो रही थी परन्तु सब सुंदरियों का भोग लगाने के लोभ में उस गार से अपनी राड खींची और फिर बारी आई पूनम पांडे की.

वो भयंकर सेक्सी एवं छरहरी कन्या थी. जैसे ही उसके मम्मे भींचे वो इतनी नाजों अदाएं दिखाने लगी कि उसे मोलेस्ट करने का मन होने लगा.

और जब उसको गोदी में उठा कर पप्पू को सरकाया तो लगा कि वो अन्दर कहीं टकराया...... उसके मुंह से आह निकली और उसने खुद अपने होंठ मेरे होंठो पर दे मारे.

सब उसके शरीर को उठा उठा कर घस्से मरवा रहे थे.....वो तो पता नहीं क्या हुआ उसे वो खुद भी मेरे पप्पू पे उछलने लग गई थी.

उसे जब मैंने बोला कि ‘बस’......तो वो बोली ‘नहीं, मैं तो आ रही हूं.........रुकना जरा भी मत......बस होने वाली हूं’

और फिर धमाधम उछाले खाने लगी थी.

जल्दी ही वो झड़ने के करीब पहुँच गई. गला फाड़ फाड़ कर जोर से चीख रही थी........

तभी किसी ने उसके पिछवाड़े में एक उंगली दे मारी........कहावत है ना कि ताबूत में आखरी कील. वो तुरंत फुरफुराने लगी और खल्लास हो गई.

अब मैंने याना को पकड़ा. उसको पीछे से बाँहों में भर कर जैसे ही उसके शरीर पर मेरे हाथ रेंगे, मैं दंग रह गया.

क्या किसी की त्वचा इतनी ज्यादा मुलायम हो सकती है. एकदम छुईमुई सी लगी.

और जब गोद में लेकर उसके अन्दर पेला तो बहुत ही कसावट भरा मुलायम और मखमली अहसास हुआ.

कुछ देर उसका अधर पान किया और फिर थोडा सा झुक कर उसके रेशमी मम्मे मुंह में भर लिए.

थोड़ी देर मखमली घिसाई करके उसे उतारा तो अब एक विदेशी स्वाद की तलब लगी.

अबकी बार स्थान परिवर्तन करने का विचार भी मन में आया.

मैं उस रशियन की कमर में हाथ डाल कर उसे पूल साइड पर लगे रिक्लाईनर की ओर ले चला. सभी हमारे पीछे पीछे बाहर आ गई.

मैं गीले बदन ही उस रिक्लाइनरपर लेट गया और उसको अपने पप्पू पर बैठा कर उसके अन्दर प्रवेश कर गया.

उसकी अत्यंत चर्बी रहित काया के साथ साथ उसकी सुरंग भी अति संकरी लगी और पप्पू महाशय अन्दर जकड लिए गए.

अब उसे अपने ऊपर लिटा कर घस्से मारने लगा. वो अपने पतले होंठो से मेरे होंठो की मुलायम मालिश कर रही थी.

वो एकदम दुबली पतली थी लेकिन भगवान से उसके उरोजों पर मेहरबानी करके उन्हें भरपूर चर्बी से नवाजा था. ऐसे भारी भरकम वक्ष मेरे सीने पर रोल हो रहे थे.

मैं अपने हाथों से उन्हें महसूस करने लगा. कुछ देर तक उस रूसी चिड़िया की फड़-फड़ाहट का लुत्फ़ लेने के बाद मेरी तवज्जो एक बार पुन: देसी माल पर गई.

उसके मेरे ऊपर से उठते ही, 'थोडा रेशम लगता है' फेम मेघना नायडू मेरे करीब आ गई.

भरे नितम्बो और गठीले वक्ष की मालकिन हालाँकि ढलने की कगार पे थी, फिर भी असीम गदराहट से भरी इस सांवली सलोनी को छकने से अपने आपको नहीं रोक पाया.

अब मैं भी उठ गया और उसे नीचे लिटा कर उसकी जांघो को फैला दिया.

उस पर झुकते ही पप्पू जी सहजता से अन्दर दाखिल हो गए. मैं पहले उसके मम्मो को कुछ देर चूसता रहा फिर होंठो को चूमते हुए कुछ देर घस्से मारता रहा.

हर बार एक नई मुर्गी का स्वाद लेते लेते शरीर तो कुछ कुछ थकने लगा था पर मन....... उसकी तो और और प्यास बढती ही जा रही थी.

सच ही कहा है किसी ने कि मन को जितना अधिक मिल चूका होता है, उससे कहीं ज्यादा और पा लेने की प्यास भी साथ साथ जग जाती है.

अब अगला नंबर था निशा कोठारी का.

रामू की इस दिलकश खोज का हौले से सर पकड़ कर मैं अपने पप्पू के सामने ले गया और उसने बिना देर किये अपने तजुर्बेकार होंठ उस पर कस दिए. वो बहुत ही मगन होकर उसे चूसने लगी.

कुछ देर चुसवा कर खड़े खड़े ही पप्पू को उसकी गहराइयों की अल्प-सैर पर ले गया.

हाथों से उसके मम्मो को थामा और मुंह से जैसे ही उसका मुखपान किया मुझे अपने ही खारे पानी का स्वाद आया.
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09-04-2012, 12:55 AM
Post: #34
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
अभी ये चल ही रहा था कि पीछे खड़े एक करारे माल पर नज़र पड़ी. वीना मलिक........

उसका नग्न सौन्दर्य और उस पर उसकी अदाएं...... निशा को छोड़ कर अब उस की ओर बड़ चला.

मैंने उसके भारी शरीर को अपनी गोद में उठा लिया.

बाकी सब ने तुरंत उसके इर्द गिर्द जमा होकर उसे थाम लिया. अब वो हम सबके हाथों में झूल रही थी.

मैंने उसे सबके सहारे छोड़ कर अपने हाथ उसकी छाती पर रखे दो बड़े बड़े गुंधे हुए आटे को गोलों पर रखा और उन्हें गूंधने लगा.

उस लेटिना ने वीना के दोनों पैरों को अपने कंधे पर झुलाया और अपना मुंह उसकी घास विहीन वाटिका में डाल कर हिनहिनाने लगी.

वीना झनझना गई और उसने मेरा मुंह अपने गुंधे आटे के गोले पर खींच लिया.

मैं 'मेड इन पाकिस्तान' मिल्क को स्वाद ले लेकर मुंह में निचोड़ने लगा. फिर कुछ देर तक उसके लबों पर चुप्पा लगाया.

इस तरह उसके चोबारों पर पर्याप्त छेड़कानी करने के बाद अब बचा था उसकी गली में थोड़ी आवारागर्दी करना.

उसे सबने लिटा दिया और मैं उस पर चढ़ गया. उस पाकिस्तानी चाची की लेने में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था.

उसका सारा शरीर जैसे डनलप का गद्दा था. हर धक्के पर रिटर्न गिफ्ट मिल रहा था वो भी एकदम करारा.

तभी वो रशियन मेरे पिछले द्वार पर आई और उसने अपना मुंह मेरे पीछे के छेद पर टिका कर जीभ थोड़ी अन्दर घुसा दी.

मैं नीचे से ऊपर तक मीठे -करंट से सराबोर हो उठा. मेरा पप्पू अचानक टॉप गियर में आ गया.

कभी वो जीभ घुसाती...... तो कभी दरार को फैला कर पुरे होंठो से उस वर्जित क्षेत्र की गीली-गर्म मालिश करती.

मैं तीव्र गति से मुहाने की ओर फिसलता चला गया. वीना भी काफी जोश में आकर मेरे घस्सों का जवाब दुगनी ताकत से देने लगी.

मेरे पिछवाड़े पर जब उस फिरंगी मुख की कोमल कारस्तानी हद से ज्यादा बढ़ी तो वहां से एक अत्यंत ही गहन सेंसेशन का बबूला उठा
और मेरे तेजी से आगे पीछे होते पप्पू में से निकल कर ऐन वीना की गली में फट पड़ा.

गली में भी सैलाब आ चूका था और इस चक्रवात में हम पता नहीं कहाँ पटक दिए गए. दोनों के दोनों निचुड़ चुके थे. मेरा भयंकर ओर्गास्म हुआ था.

तूफ़ान थमा तो हमने अपने आप को एक दुसरे की बाँहों में जकड़ा पाया. अभी भी नीचे की ओर स्लो मोशन में उचक-निचक का खेल चल रहा था.

मैं थक के चूर हो चूका था. उठते ही सबने तालियाँ बजायी.

तभी मोहम्मद की आवाज़ आई. पता नहीं कब से वो दूर कुर्सी पर बैठ कर जल क्रीड़ा का लाइव शो देख रहा था.

वो बोला....'तुम सबने मेरे दोस्त से बहुत मेहनत करवा ली. चलो अब इन्हें नहला धुला कर कुछ देर दुसरे कमरे में २-३ घंटे की नींद ले लेने दो. फिर एक और इंतजाम कर रखा है मैंने इनके लिए.'

फिर सबने मुझे रगड़ मसल कर नहलाया धुलाया और फिर मैं जाकर एक शयन कक्ष में गहन नींद के आगोश में समां गया.
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09-04-2012, 12:56 AM
Post: #35
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
मोबाईल का अलार्म बजा और मैं नींद से जागा. चारो ओर देखा तो पाया कि मैं होटल के रूम में हूं.

अरे मैं तो मोहम्मद भाई के यहाँ था, अभी अभी तो हिरोइनों को निपटाया था. मैं होटल कैसे आ गया.

जैसे जैसे मैं नींद से बाहर आया मुझे महसूस हुआ कि मैं एक बहुत ही हसीन ख्वाब देखा था.

मैं तो जैसे उसे ही सच समझ रहा था. मुझे बहुत दुःख हुआ.

चलो कम से कम रात ज़रीन के साथ बिताया समय तो सच था, ऐसे मैंने अपने आपको समझाया और बाथरूम की ओर बढ़ चला.

***

दिन के १० बज चुके थे. मैं नाश्ते के लिए उसी रेस्तरां ‘अल-नखील’ में गया जो सपने में देखा था.

बहुत वेक्यूम सा लग रहा था. एक साथ इतनी सारी हीरोइन तो हाथ से निकली ही निकली वो डायमंड भी हाथ से गए.

और हाँ, वो आक्शन गर्ल, उसे तो सपने में भी निपटा नहीं पाया.

मैंने अपने आप से प्रश्न किया. कल रात ज़रीन के साथ गुज़ारा समय और रात सपने में उड़ाए गुलछर्रे, दोनों में क्या फर्क है.

दोनों ही डेड हो चुके हैं और दोनों ही स्मृति का हिस्सा भर हैं. दोनों की याद बराबर गुदगुदा रही है.

बल्कि सपने वाली ज्यादा गुदगुदा रही है...... याने कि कोई फर्क नहीं......

गुज़रा समय भी सपने की ही मानिंद हो जाता है....... दोनों का ही कोई अस्तित्व नहीं अब .......

इसीलिए जो जानते है वो कहते है कि पास्ट से कोई अटेचमेंट ना रखते हुए सिर्फ और सिर्फ इस पल में जीना चाहिए. खैर..............

आज का दिन पूरा फ्री है.......कोई साथी भी नहीं.......क्यों ना नए क्लाइंट से बात की जाय, हो सकता है वो कोई जुगाड कर दे आज का.

मैं फोन लगाता हूं. सामान्य शिष्टाचार के बाद मैं मुद्दे की बात पर आता हूं.

वो मुझे अच्छी एस्कार्ट सर्विस से कोई बढ़िया लड़की उपलब्ध कराने की बात करता है.

मैं प्रोफेशनल लड़की के लिए मना करता हूं तो वो बोलता है कि आप इंतज़ार करो, आधे घंटे में आपको नान-प्रोफेशनल लड़की हाज़िर जो जायेगी.

***

रूम की बेल बजती है. दरवाजा खोला तो एक सुन्दर लड़की सलवार कुर्ते में नज़र आती है.

अपना परिचय वो सुनयना कह कर देती है. उसे अंदर सोफे पर बैठा कर उसके सामने बैठ जाता हूं.

‘आप हमारी कंपनी से नाता जोड़ रहे हैं इसकी हमें बहुत खुशी है. मैं एम.डी. सर की सेक्रेटरी हूं और उन्होंने मुझे आपको कंपनी देने के लिए भेजा है.’........सुनयना ने पूरा परिचय दिया.

‘थेंक यू सुनयना, बट ऐसा लगता है कि आप मजबूरी फील कर रही हैं यहाँ आने की’.....मैंने उसका चेहरा पढ़ते हुए कहा.

‘नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं है, आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगी, आप निश्चिन्त रहिये.’

‘नहीं सुनयना, मैं आपकी इच्छा के खिलाफ कुछ भी नहीं करूँगा. चलिए आप मुझे दुबई घुमाइये.’

‘नहीं सर, आप विश्वास कीजिये मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, आप आदेश कीजिये.’

‘सच कह रही हो.............. चलो तुरंत अपने सारे कपड़े निकालो.’....मैंने उसकी आँखों में आँखे डाल कर कहा.

उसने अपनी निगाहें झुका ली. वो कुछ एकदम जड़ हो गई.

मैं उसके पास जाता हूं और उसके दोनों कंधे पकड़ता हूं. वो निगाहें ऊपर करती है.

उसकी आँखों में पानी आ जाता है. मैं आँखों से उसे निश्चिन्त रहने का इशारा करता हूं.

‘आप कहीं एम.डी. सर से बोल तो नहीं देंगे, वरना वो नाराज़ हो जायेंगे.’......उसने पूछा.

‘सुनयना, तुम बिलकुल भी डरो मत, मैं तुम्हारी बहुत तारीफ़ करूँगा उनसे.’

‘थेंक यू सर.’

‘इट्स आल राईट सुनयना. पर ये बताओ कि जो मैं पूछूँगा उसका सही सही जवाब दोगी.’

‘जी आप कुछ भी पूछिये.’

‘मैं समझता हूं कि तुम कई बार सेक्स कर चुकी हो, तो फिर सेक्स से घबरा क्यों रही हो.’....मैं पूछता हूं.

‘हाँ सर, मुझे रेगुलर सेक्स करना पड़ता है, पर किससे करना है ये चुनाव मेरे हाथ में नहीं होता है. या तो सर का बिस्तर गरम करना होता है या उनके मेहमान का, ऐसे भी कहीं सेक्स का मज़ा आ पाता है.’...वो बोली.

‘तो इसका मतलब तुम्हे सिर्फ और सिर्फ दूसरे को ही खुश करना होता है, शायद सामने वाला तुम्हारी फीलिंग्स का कोई ख्याल नहीं करता होगा. है ना ‘......मैंने फिर पूछा.

इस बार वो कुछ बोल नहीं पाई और सिर्फ सिर हिलाकर हाँ मैं जवाब दिया और फिर अपनी हथेलियों से अपना चेहरा ढँक लिया. जब हाथ हटाया तो उसके चेहरे से बड़ी बेचारगी झलक रही थी.

मैं उठकर फिर सामने बैठ जाता हूं. कुछ देर सिर्फ उसे देखता रहता हूं. वो कभी नीचे देखती तो कभी मुझे.

मैं उठकर कॉफी का आर्डर देता हूं. कुछ देर मैं चुप रहता हूं.

वो बाथरूम चली जाती है. जब वो वापिस बाहर आती है तब तक कॉफी आ चुकी होती है.

वो तुरंत कॉफी तैयार करती है. हम दोनों कॉफी पीने लगते हैं. मैं जब उसपर से नज़रें नहीं हटाता हूं तो उसे हलकी सी हंसी आ जाती है.

‘ऐसे क्यों देख रहे हैं आप मुझे. मेरी नादानी पर हंसी आ रही है ना आपको.’.......वो काफी संयत हो चुकी थी.

‘नहीं ऐसी बात नहीं है.........बस आज तक तुम्हारी जैसी लड़की नहीं मिली मुझे इसलिए तुम्हे जी भर के देख रहा हूं.’ ......... मैं जवाब देता हूं.

‘आप जैसा भी मैंने कोई नहीं देखा है. आप बहुत अच्छे हैं.’........वो निगाहें झुकाती हुई बोली.

‘चलो आगे पूछता हूं. तुम्हारे एम.डी. बिस्तर में कैसे पेश आते हैं तुम्हारे साथ.’

‘वो सिर्फ अपना ही ख्याल करते हैं. मुझे तो बस वो खिलौना समझ कर खेलते हैं.’

‘और बाकि उनके मेहमान.’

‘वो तो मुझे बाजारू समझ कर बर्ताव भी बुरा करते हैं. सब कुछ सहन करना पड़ता है.’

‘तो फिर ऐसी नौकरी क्यों कर रही हो.’

‘एम.डी. सर बहुत दयालु इंसान है. उन्होंने मेरे परिवार के लिए मुंबई में घर खरीद कर दिया है. और भी बहुत
अहसान है तो बस वो ही चुका रही हूं.’

‘तो क्या तुम्हे ओर्गास्म नहीं होता है जब भी ऐसे सेक्स करती हो.’

‘सच बताऊँ, मजबूरी में कभी भी ओर्गास्म नहीं होता है.’

‘और अगर वो बहुत लंबा चले तब भी नहीं, कभी तो तुम्हारी छूट होती होगी.’.....मेरे प्रश्न जारी थे.

‘शुरू से ही नेगेटिव माइंड-सेट हो जाता है, तो हालाँकि दोनों पैर तो खुल जाते हैं मजबूरी में पर मन नहीं खुल पता है.
बस यही कारण है कि ओर्गास्म नहीं हो पता है. पहले कभी होता था पर आजकल तो बिलकुल नहीं.’......वो बताती है.

‘इसका मतलब तुम सेक्स से विरक्त होती जा रही हो. ये तो अच्छी बात नहीं है.........अभी तो तुम्हारी शादी भी होनी है........ऐसे कैसे चलेगी लाइफ.’

‘अब जैसे भी चले काटनी तो पड़ेगी ही.’

‘अच्छा ये बताओ तुम्हे क्या याद आता है, कब तुमने आखिर बार सेक्स को एन्जॉय किया था.’

‘साल भर से तो ऊपर ही हो गए होंगे.’

‘तुम्हारा मन नहीं करता है.’

‘सच बताऊँ, बहुत करता है.......कभी कभी तो मुझे अपने आप को शांत करना पड़ जाता है.’

‘तो तुम क्या सोचती हो कि किस परिस्थिति में तुम सेक्स का भरपूर मज़ा ले सकती हो.’...मैं इस तरह की लड़की की मानसिकता जानना चाह रहा था.

वो थोड़ा सकुचाती है. परन्तु फिर बताने लगती है.........

‘मुझे कोई बहुत प्यार करे और मैं बिलकुल डूब जाऊं उसमे तो फिर उसके साथ जो सेक्स होगा वो बहुत आनंददायक होगा. पर ये सिर्फ मेरी सोच है, शायद यथार्थ में ऐसा संभव नहीं है.’

मैं उसकी आँखों में फिर से झाँकने लगता हूं.

कुछ ही देर में उसकी निगाहें फिर से झुक जाती है. वो जब फिर नज़रें उठती है तो मुझे अपने में डूबा पाती है.

‘आप फिर ऐसे क्यों देखने लगे मुझे.’
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09-04-2012, 12:56 AM
Post: #36
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
‘इसलिए कि तुम जैसी कोई दिखी नहीं मुझे कभी.’.......और उसकी आँखों में झांकते झांकते उसकी ओर बढता हूं.

और फिर उसके पैर के पास बैठ कर उसकी गोद में अपने हाथ रख देता हूं.

नज़रें अभी भी उनकी आँखों में ही थी. अब वो भी अपलक मुझे ही देख रही थी.

अचानक वो अपने हाथ मेरी आँखों पर रख देती है. मेरी आँखे बंद हो जाती है.

अब मैं अपना सर उसकी गोद में रख कर उसके पैरों को बड़े ही प्यार से पकड़ लेता हूं.

उसके हाथ स्वमेव ही मेरे सर पर आ जाते हैं.

कुछ देर हम इसी अवस्था में रहते हैं.

फिर पता नहीं उसे क्या होता है वो अपने हाथों से मेरे बालों को हौले से सहलाने लगती है.

मुझे बहुत अच्छा फील होता है. मैं उसकी गोद को और कस के पकड़ लेता हूं. वो काफी देर तक मेरा सर सहलाती रहती है.

दस मिनट ऐसे ही निकल जाते हैं.

अचानक वो बोलती है........’क्या मैं आपको सर के बजाय आपके नाम से बुला सकती हूं.’

मैं अचानक चौंक कर उठता हूं ......’ऑफ कोर्स, माय प्लेज़र.’

‘अभि आप बहुत अच्छे हो. आप सबसे अलग लगे मुझे.’....अब उसके बाल सहलाते हाथ मेरे चेहरे की ओर बढ़ चले.

मैं मुस्कुरा देता हूं. वो हथेली में मेरा चेहरा थाम लेती है.

मैं उठ कर उसके बराबर सोफे पर बैठ जाता हूं. उसके हाथ अभी भी मेरा चेहरा बड़े ही प्यार से थामे हुए थे.

मैं भी अपनी हथेलियों में उसका चेहरा भर लेता हूं. वो अब बड़े प्यार से मुझे देखने लगती है.

तभी मैं बोलता हूं.........’सुनयना अगर बुरा ना मानो तो मैं तुमको हग कर सकता हूं एक बार.’

इस बात का जवाब देने के बजाय वो मेरा चेहरा छोडती है और मेरे सीने पर झुकते हुए उसमे एकदम से सिमट जाती है.

मेरे हाथ अपने आप उसके इर्द गिर्द लिपट जाते हैं. मैं उसको अपने सीने में छुपा लेता हूं.

अपने एक हाथ से उसकी पीठ सहलाने लगता हूं और दूसरे से उसके बाल. पता नहीं कितनी देर हम ऐसे ही रहते है.

जब मैं उसे उठा कर अलग करता हूं तो वो मेरे आगोश से निकलने के लिए मना कर देती है.

‘‘यार इस तरह से मेरी कमर दुखने लगी है.’.....मैं उसे कहता हूं.

वो जवाब देने के बजाय अपने वजन से मुझे पीछे सोफे पर धकेलने लगती हैं.

मैं पीठ के बल धीरे से पीछे ढुलक जाता हूं और साथ साथ वो भी मेरे ऊपर आ जाती है. अभी भी उसका चेहरा मेरे सीने में पैवस्त था.

अब मैं लेटे लेटे ही उसे फिर से लपेट लेता हूं. फिर इसी तरह कुछ देर और हम पड़े रहते हैं.

फिर मैं उसे थोड़ा ऊपर खींचता हूं. वो अपना गला मेरे कंधे में घुसा देती है. अब वो ठीक मेरे ऊपर आ जाती है, उसके वक्ष मेरे सीने पर महसूस होने लगते हैं.

मैं उत्तेजना से भर उठता हूं. मेरा पप्पू कड़क हो जाता है.

अब वो अपना सर उठाती है और अपने गाल मेरे गालों पर रख देती है. कुछ देर तक वो गाल से गाल सहलाती रहती है.

अचानक वो मेरा मुँह पकडती है और अपना सिर उठाकर मेरे होंठों में अपने होंठ डाल देती है और उन्हें बेतहाशा चूमने लगती है.

जिस तरह से वो चूम रही थी ऐसा लग रहा था कि पहली बार वो ऐसा कर रही है. बहुत ही पेशोनेट हो जाती है वो.

कोई दस मिनट बाद वो रूकती है और मेरी आँखों में देखती है. फिर वो अपनी नज़रें झुका कर मुस्कुराती है और फिर से मेरे सीने में गुम हो जाती है.

मैं उसे जकड़े हुए धीरे से बैठ जाता हूं और फिर उसे गोद में उठा कर बेड रूम की ओर बढता हूं. वो अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लेटी है.

जैसे ही उसे बेड पर रखता हूं वो शर्मा कर बिस्तर में मुँह छुपा लेटी है और बस इतना ही कह पाती है कि .........’प्लीज़ लाईट बंद कर दो.’

मैं एकदम अँधेरा कर देता हूं. फिर धीरे से उसके पास आकर लेट जाता हूं. वो मेरी ओर करवट लेटी है और फिर से मुझसे चिपक जाती है. मैं भी उसे फिर जकड़ लेता हूं.

वो खींच कर मुझे अपने ऊपर करने लगती है. मैं अपने दोनों हाथ और पैरों पर वजन लेटे हुए उसके ऊपर आ जाता हूं.

वो अपने दोनों पैर चौड़े करके मुझे अपने अंदर ले लेती है. मेरा पप्पू उसके क्रोच पर टिक जाता है.

वो अपने हाथों से मेरा चेहरा खींच कर फिर चूमने लगती है.

उसके हाथ मेरी पीठ पर फिरने लगते हैं.

अचानक उसके हाथ मेरे लोअर को नीचे खिसकाने लगते हैं. कुछ ही देर मैं वो मेरा लोअर और अंडरवियर निकालने में कामयाब हो जाती है. अभी भी चुम्बन जारी था.

अब उसके हाथ मेरे पुट्ठों को सहलाने लगते हैं.

अचानक मैं घूमता हूं और उसको अपने ऊपर ले लेता हूं. उसके कुर्ते को पकड़ कर ऊपर खींचने लगता हूं. वो भी थोड़ा उठ कर निकालने में मदद करती है. वो फिर मुझसे चिपक जाती है.

अब मैं उसकी ब्रा के हुक खोलता हूं और उसके स्ट्रेप कन्धों से नीचे सरका देता हूं. वो खुद ब्रा को अपने वक्ष से खींच कर अलग कर देती है.

फिर वो उठ कर मेरे पेट पर बैठ जाती है और अपने सलवार का नाडा खोलती है. मैं भी अपना टीशर्ट और बनियान निकाल देता हूं.

वो खड़ी होकर अपनी सलवार और पेंटी निकाल देती है और फिर से मेरे ऊपर आकार लेट जाती है.

उसके बब्बू मेरे सीने में चुभने लगते हैं वहीँ मेरा पप्पू उसके पेट पर.

अब वो मुझे अपने ऊपर कर लेती है. मैं अपना सिर उसके मम्मों पर लाता हूं तो वो उसे उन पर दबा देती है. मैं उन्हें चूसने लगता हूं.

कुछ ही देर में वो सिसकने लगती है. बारी बारी से दोनों मम्मों को चूसता जाता हूं.

वो गरमाने लगती है. वो अपनी क्रोच को मेरे पप्पू पर घिसने लगती है.

मैं अपना एक हाथ उसकी योनी पर ले जाता हूं. जैसे ही क्लिट को छूता हूं वो सरसरा उठती है.

मैं अचानक उसके मम्में छोड़ता हूं और सीधा अपना मुँह उसकी योनी पर ले जाता हूं. वो मना करती है पर मैं जबरदस्ती उसमे मुँह घुसेड़ देता हूं

वो चीख उठती है. मैं जोर जोर से उसकी योनी को चूसने और चाटने लगता हूं. वो पनियाने लगती है.

उसकी लगातार चींखे निकल रही थी और मैं उसे चूसता ही जा रहा था. वो अचानक भरभरा कर ढेर हो जाती है.
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09-04-2012, 12:57 AM
Post: #37
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
सुनयना के ढेर होते ही उसके हाथों की पकड़ मेरे बालों पर से ढीली पड़ती चली गई. मैं उठा तो मैंने अपना पूरा मुँह उसके योनी-रस से लिथड़ा हुआ पाया.

मैंने बाथरूम जाकर अपना चेहरा साफ़ किया और वापिस आकर सुनयना के बाजू में लेट गया.

वो तो अभी भी अपने इस भीषण ओर्गास्म के गिरफ्त में थी और उसकी साँसे अब तक सामान्य नहीं हो पा रही थी.

मैं करवट लेकर अपना मुँह उसके कंधे में घुसाता हूं और एक हाथ उसके मम्मों पर रखकर अपना एक पैर मोड़ कर उसके पैरों के ऊपर रखता हूं.

जैसे ही मेरे बेईमान हाथ की शैतानी शुरू हुई, वो तुरंत करवट लेकर मुझ से लिपट गई और मुझे कस के जकड़ लिया.

मेरे होंठ उसके नंगे कंधे पर आ जाते हैं. मुलायम गद्देदार अंग का स्पर्श मेरे होंठों पर थरथराहट उत्पन्न कर देता है और मैं उन्हें चूमने का लोभ संवरण नहीं कर पाया.

उधर उसे भी कुछ मस्ती सूझी तो उसने अपने होंठ से मेरे कान की लटकन सड़प ली और फिर उस मृदु-अंग को मज़े ले लेकर चूसने लगी.

उसके शरीर की सुगंध मुझे बेहद खुशगवार लग रही थी. अपनी नाक को उसकी त्वचा पर घिस घिस कर उसे अपने नथुनों में समाने लगा.

इतनी खेली-खायी होने के बावजूद भी वो मुझे इतनी मासूम सी प्रतीत हो रही थी कि मैं उस पर फ़िदा होने लगा. मैं उसके पावन प्रेमाबंध में नख से शिख तक आबद्ध होने लगा था.

इस श्वेत-वर्णीय तरुणी पर मुझे दुनिया भर का प्यार उमड़ आया और उसी के वशीभूत मैंने उसकी काया को कस कर आबंधित कर लिया और उसके गालों पर चुम्मों की अनवरत झड़ी लगा दी.

उसने भी मेरी भावनाएं एकदम सही ट्यूनिंग से कैच कर ली और उसने भी मुझे अपने में लिपटा लिया और कस के चिपटने लगी.

हम दोनों ही एक दूसरे के और और नज़दीक पहुंचना चाह रहे थे परन्तु शरीर की सीमा-रेखा हमें एक जान नहीं होने दे रही थी.

पता नहीं एक-दूजे लोग कैसे समा जाते हैं, हम तो इस वक्त जरा भी सफल नहीं हो पा रहे थे.

अब मैंने फिर से अपना निशाना ताड़ा और अपना मुँह उसके निप्पल पर ले आया. उसे गुलाबजामुन की तरह पूरा गप्प किया और फिर पूरी शिद्दत से उसे चूसने लगा.

उसने कोई विरोध नहीं किया वरन वो पलट कर पीठ के बल हुई और मुझे अपने पर्वत शिखरों पर जी भर कर कुलाँचे भरने की पूरी आज़ादी प्रदान कर दी.

मैंने अपने आपको, अपने चोपायों पर संतुलित किया और उसके उभरे कोमलांगों में फिर से यहाँ वहाँ मुँह मारने लगा.

मेरे होंठ और जीभ की सरपट-सरपट गीली कार्यवाही, उसमे पुन: काम तरंगे प्रवाहित करने लगी.

उसके शरीर में डायनामिक फ़ोर्स उत्पन्न होने लगा जिसके चलते वो मस्ती से मचलने लगी. मज़े की अधिकता उसके मुँह से कराहों के माध्यम से अभिव्यक्त होने लगी.

वो इतनी मदमस्त हो गई कि उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें. कभी मेरा मुँह अपनी छाती में दबाती कभी; अपनी दोनों टाँगे बिस्तर पर पटकती, तो कभी मुझे अपनी बाँहों में समेटने का असफल प्रयास करती.

इसी तारतम्य में अचानक उसके कर-कमल मेरे कटी-प्रदेश मध्य स्थित, अग्र-उर्ध्व दौलीत, मखमली चर्म-मंडित, अति-सख्त श्याम दंड पर पड़े, तो उसके अंग-प्रत्यंग में उत्साह और उमंग की सैकड़ों लहरें दौड़ गई.

वो मस्तानी अब मेरे दंड को बड़ी ही बेहयाई से मुठियाने लगी.

मैं अभी भी उसके पर्वत-द्वय की ख़ाक छान रहा था जबकि पर्वतमाला के सुदूर ढलान पर स्थित उसका महीनों से सूखा पड़ा पहाड़ी झरना आज ही आज में दूसरी बार पुन: तीव्र वेग से छलक उठा.

मेरी जालिम कार्यवाही से उसकी छाती पर जड़े दो श्याम-रत्नों पर उत्पन्न होने वाले कामुक संवेगों से वो इतनी उद्वेलित हो गई कि उसका दूसरा हाथ, खुद-ब-खुद उसके झर-झर फुरफुराते पहाड़ी नाले पर पहुँच गया.

उसकी उँगलियाँ उस तंग गीली गार में रिसती चिकनाई में मटकने लगी. ये उसका, इस अजब-गजब संवेदनों से भरे खेल में लगातार बढ़ती बैचेनी को काबू में लाने का असफल सा प्रयास था.

पर वो बावली क्या जाने कि अनजाने ही वो अपने अति-संवेदनशील अंग को कुरेद कुरेद कर उसकी खुजली को और बड़ा ही रही थी.

अब उसके दोनों कर-कमल, हस्त-मैथुन में लिप्त थे. एक हाथ मेरे दंड पर व्यस्त, तो दूजा स्वयं की फुद्दी में पैवस्त.

आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती. अब तो उसकी शीरी को मेरे फरहाद से मिलना ही था.

और ये नेक कार्य भी उसके ही दोनों हाथों ने अंजाम दिया. वो अपने हाथ से मेरे बकरे को हलाल-गृह की ओर खींचने लगी.

मैंने भी अपने दोनों घुटने उसकी जांघों के बीच में फसायें और उनको चौड़ाते हुए अपने पिस्टन को इंजन के मुख पर झुकाता चला गया.

केस्ट्रोल की उत्तम चिकनाई युक्त स्निग्धता में मेरा पिस्टन इंजन में समाता चला गया और देखते ही देखते किसी कुशल डाइवर की भांति वो उस पूल में ओझल हो गया.

उसके हाथों ने जो जिम्मा लिया था वो पूरा हो गया था. मेरा पप्पू जन्नते-गार में मस्ती की डुबकियां लगाने लगा.

‘शीरी-फरहाद की तो निकल पड़ी’.
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09-04-2012, 12:57 AM
Post: #38
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
और अब शुरू हुआ वो खेल जिसके लिए सारी कायनात पागल है. मैं भी पूरा मगन होकर एक्स्बी-नेशन के इस राष्ट्रिय खेल को खेलने लगा.

खेल के शुरुवाती दौर में सारी सर्विस में ही कर रहा था. कभी मेरे धक्के दायर हो रहे थे, तो कभी कुछ मिस-फायर. लेकिन कुछ ही देर में हम दोनों खिलाडियों ने अपनी लय पकड़ ली.

नीचे जब सब कुछ स्मूथली हेंडल होने लगा तो, कुछ अतिरिक्त बोनस मज़े पाने और देने के लिए मैंने अपने होंठ सुनयना के होंठों में ठेल दिए. उसने उचक-निचक करते करते ही मेरे अधरों को बुरी तरह से जकड़ लिया.

अब तो उसकी निकलने वाली सारी कराहें और आंहे मुँह के बजाय नाक से निकलने लगी.

मैंने उसकी मस्ती में थोड़ा और तड़का लगाने के लिए अपनी कोहनियों को मोड़ कर उँगलियाँ उसकी छाती पर उभरे अंगूरों के इर्द-गिर्द कसी और लगा उन्हें मरोड़ने.

मेरा ऐसा करना हुआ और सामने वाला खिलाड़ी का खेल भी पूरे शवाब पर आने लगा.

मुझे अब वो एक भी ‘ऐस’ नहीं मारने दे रही थी और हर सर्विस पर जोरदार रिटर्न लगाने लगी.

अब लंबी लंबी रैली चलने लगी. दोनों ही पूरे जोशो-खरोश से शॉट पे शॉट लगाने लगे.

अभी कुछ देर पहले ही उसने पहला सेट लूज किया था तो इस सेट में वो कतई खेल को जल्दी खतम करना नहीं चाहती थी. पर उसे डर था कि मैं जल्दी ये सेट ना छोड़ दूं.

पर आप तो जानते ही हैं ना आपके अभि ब्रो को. वो जब तक चाहे, खेल में बना रह सकता है. लिहाजा अब मैं सर्विस करने में थोड़ी ढील देने लगा.

वो डर गई कि शायद मैं आ रहा हूं तो उसने मेरे होंठ उगले और बोली.....’अभि, मुझे तो जरा और देर लगेगी. कहीं तुम हो तो नहीं रहे हो ना.’

तो मैं बोला.......’बेबी, आज तुम पर किस्मत मेहरबान है तो मैं तुम्हारे साथ ना-इंसाफी करने वाला कौन होता हूं. तुम हुकुम तो करो, ये उचक-निचक अगले एक घंटे तक भी जारी रह सकती है.’

‘ओह माय जानू, यू आर सिम्पली सुपर्ब.’.........ये कहते हुए मारे खुशी के मुझसे कस के चिपट गई और नीचे से हौले हौले शॉट मारने लगी.

‘एनिथिंग फोर यू डार्लिंग. आज तो तुम जी भर के जी ही लो.’......ये कहते हुए मैंने फिर से अपने सारे मोर्चे मुस्तैदी से संभाल लिए. वोही.... चुम्बन ..... मर्दन.... और..... धमाधम.

कुछ देर यूँ ही लयबद्ध आवृति में दोनों ओर से बराबरी का खेल चलता रहा.

फिर जब दोनों को ही एक अल्प विराम की आवश्यकता महसूस हुई तो मैंने रूककर उससे कहा........ ‘सुनयना, तुम अब मेरे घोड़े की सवारी करना चाहोगी.’

वो बड़ी ही हैरानगी से देख कर बोली........ ‘ये घोड़ा कहाँ से बीच में आ गया हमारे.’

मैं हँसा और एक झटके में पलटी मारते हुए. बम्बू घुसाये हुए ही, उसको अपने ऊपर ले लिया.

उसके कन्धों को थामते हुए उससे कहा..........’ये रहा घुड़सवार और ये रहा घोड़ा.’

मैंने उसके हाथ मेरे आधे बाहर पप्पू पर टिकाते हुए घोड़े का मतलब समझाया और फिर बोला.......’तो चलो अब हो जाये घुड़सवारी.’.......ऐसा बोलकर मैं अपने पुट्ठों को ऊपर नीचे कर करके उसे उछालने लगा.

बात उसके पूरी समझ में आ गई थी. उसने मेरी छाती पर फिसलते हुए अपने हाथों से मेरे कन्धों को थामा और धचक-पेल शुरू कर दी.

वो घस्से तो लगा रही थी पर एकदम अनाड़ी की तरह. रिदम सेट ही नहीं हो पा रही थी.

ये देख कर मैंने अपने हाथों में उसके नितंब थामे और फिर नीचे से जोरदार घस्सों की बौछार कर दी. वो अचानक नीचे से होने वाले लगातार तेज़ आक्रमण से हकबका उठी.

उसके पेल्विस में मस्ती का जो तेज़ बवंडर उठा वो उससे सराबोर हो उठी. पता नहीं सैकड़ों घस्सों के बाद मैं थक कर रुक गया.

वो तो परन्तु तेज़ लहरों में बहे जा रही थी. मेरे रुकने पर वो फिर से अपना अनाड़ी खेल दिखने लगी.

मैं एकबार से फिर उसको साधारण भारतीय मुद्रा में ले आया........मतलब कि मिशनरी पोस्चर में. पप्पू को एकबारगी अच्छे से सेट किया और जड़ तक अंदर ठेल दिया.

कोहनियों को टिकाते हुए अपने दोनों निप्पल्स को उसके निप्पल्स से जोड़ दिया और हाथों में उसका चेहरा थामा और होंठों से होंठ मिला दिए. आल सेट .............एंड गो............

और चल पड़ी अपनी नाव.........धमाधम.... धमाधम.... धमाधम....

और उधर वो भी लगी थी मेरी हर ईंट का जवाब पत्थर से देने में. घस्सों का बहुत ही सुन्दर तारतम्य जम गया था. हम दोनों अनवरत सिन्क्रोनाईस्ड घस्सों में लीन हो गए.

उसके दोनों पैरों ने मेरे पैरों के इर्द-गिर्द कुंडली मारी हुई थी और दोनों हाथों से मेरी पीठ को जकडा हुआ था.

दोनों ही पसीने पसीने हो चुके थे.

मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरे और उसके निप्पल्स एक दूसरे से चिपक गए हैं और उसकी नोंकों से तेज़ उर्जा मेरे अंदर भर रही है.

और यही उर्जा मेरे पप्पू से होते हुए पुन: उसमे प्रवाहित हो रही है.

ऊपर से आ रही है और नीचे से वापिस जा रही है.

इस तरह एनर्जी का एक सर्किल बन गया है और वो हम दोनों में रोटेट हो रही है.

घस्सों में तेज़ी आती जा रही थी और दोनों एक दूसरे को बुरी तरह से जकड़े हुए थे.

मैंने उसके होंठ छोड़े और अपना चेहरा उसके सिर के पास तकिये में घुसा दिया.

और जैसे जैसे शीर्ष के करीब आने लगे ये उर्जा का चक्र तेज़ी से हम दोनों के शरीरों में घूमने लगा.

हम अब अपने भौतिक शरीर के अहसास से मुक्त होते जा रहे थे और ये उर्जा हम दोनों को एक दूसरे से और और नजदीकी से आबद्ध किये जा रही थी.

घस्सों का वेग अपने चरम पर था.......और अचानक उसके मुँह से एक चीख सुनाई दी और फिर वो पत्तों की तरह कांपने लगी.

यही वो वक्त था जब मेरे अंदर भी दो स्थानों पर विस्फोट हुए.

एक तो नीचे, जिसके परिणाम स्वरुप मेरे दंड की सख्ती अब पिघल कर सुनयना के प्रेम-छिद्र में समाने लगी थी.

और दूसरा मेरे मस्तिष्क में जिसके फलस्वरूप मेरा दिमाग शून्य हो गया.

.............

............

............

पता सब चल रहा था पर दिमाग बिलकुल रुक गया था. अवेयरनेस पूरी थी पर विचार सारे के सारे दम तोड़ चुके थे.

और ये क्या हुआ........मैं तो पूरा का पूरा मेल्ट होकर उसमे समा गया.

द्वेत मिट गया...... एक जान हो गए हम...... शरीर का कोई भी भान नहीं था इस वक्त............उर्जा-शरीर एक दूसरे में आकंठ डूबे हुए थे.

ये था सम्भोग के शिखर पर ट्रान्स का मेरा पहला अनुभव.

शायद भौतिक और मानसिक तल पर होने वाले सेक्स से एक कदम आगे बड़ा कर .............आत्मिक तल पर घटित होने वाले सम्भोग की एक विरल सी झलक.

जाने कितनी ही देर हम एक दूसरे में समाये रहे.

फिर थोड़ा सा खिसक कर मैंने नाईट बल्ब को ऑन कर दिया. मेरा पप्पू सिकुड़ कर उसकी गली से बाहर आ चुका था पर मैं वैसे ही लेटा रहा और उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर सहलाने लगा.

उसने आँख खोली........मेरी और देखा.............उसके होंठ कुछ कहने को लरजे.........फिर वे कंपकपाने लगे.........

कंठ अवरुद्ध हो गया............कुछ कहने का अथक प्रयास किया उसने पर सब व्यर्थ............अंदर की सारी भावनाएं आँखों से फूट पड़ी.

उसने अपनी हथेलियों से अपना चेहरा छुपाने का प्रयास किया पर मैंने उसके हाथ पकड़ लिए.

उसने अपना चेहरा मोड़ा तो उसका बाँध टूट पड़ा और उसकी भरभरा कर रुलाई फूट पड़ी.

मैंने उसका चेहरा अपनी ओर किया तो देखा कि वो एक मासूम बच्ची की तरह से रो रही थी.

मुझे उस पर इतना ज्यादा प्यार उमड़ आया कि मेरे भी आँसू निकलने को तत्पर हो गए.

पुरुषोचित इगो के वशीभूत हो मैंने अपनी भावनाएं दबाई और उसको अपने पहलु में लपेट लिया.

काफी देर तक उसका, पता नहीं क्या-क्या अंदर रुका हुआ, आंसुओं में धुल-धुल कर साफ़ होता रहा.

मैं उसे लिपटाये हुए ही करवट से हो गया और अपने हाथ से उसकी पीठ सहलाते रहा.

वो चुप हुई तो हम दोनों उठ कर बैठ गए. एक बार फिर मैंने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भरा.

उसका अश्रुपूरित चेहरा............उसने मुझसे नज़र मिलाई.........

मैंने अपने होंठों को उसकी पलकों से लगा कर उसकी अमूल्य अश्रु की बूंदों को अंगीकार किया.

उसने फिर से मुझसे नज़रें मिलाई और फिर एक मनमोहक मुस्कान के साथ पलकें झुका ली.

उसके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं बचा था.

उसकी झुकी पलकें............जीवंत मुस्कान............और कृतज्ञतापूर्ण आंसू............. ये बहुत कुछ जो कह रहे थे.
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10-14-2013, 03:30 AM
Post: #39
RE: परदेस से शुरू हुआ चुदाई का सिलसिला
very good peace

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