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मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
03-30-2013, 07:25 AM
Post: #1
Wank मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
तरुन 18 साल का छोकरा था उसका लण्ड हरदम खड़ा रहता था कुदरत ने उसके लण्ड में बड़ी ताकत भर दी है साला बड़ी मुश्किल से शांत होता था। पड़ोस में एक बल्लू नाम का जवान रहता था उन्हें तरुन और पूरे मुहल्ले के लड़के चाचा कहते थे, तरुन और बल्लू दोनो बड़े गहरे दोस्त थे। कई चालू लड़कियाँ भी उनकी दोस्त थीं जिन्हें दोनो साथ साथ चोदते थे। उन्हीं में एक मोना नाम की लड़की थी। स्कूल बस में आते जाते; लड़कों के कंधों की रगड़ खा खा कर मोना को पता ही नही चला की कब कुल्हों और छातियो पर चर्बी चढ़ गयी.. जवानी चढ़ते ही मोना के नितंब बीच से एक फाँक निकाले हुए गोल तरबूज की तरह उभर गये. मोना की छाती पर भगवान के दिए दो अनमोल 'फल' भी अब 'अमरूदों' से बढ़कर मोटे मोटे 'बेलों' जैसे हो गये थे । मोना के गोरे चिट्टे बदन पर उस छोटी सी खास जगह को छोड़कर कहीं बालों का नामो-निशान तक नही था.. हलके हलके रोयें मोना की बगल में भी थे. इसके अलावा गर्दन से लेकर पैरों तक वो एकदम चिकनी थी. लड़कों को ललचाई नज़रों से अपनी छाती पर झूल रहे ' बेलों ' को घूरते देख मोना की जांघों के बीच छिपी बैठी हल्के हल्के बालों वाली, मगर चिकनाहट से भरी तितली के पंख फड़फड़ाने लगते और बेलों पर गुलाबी रंगत के 'अनार दाने' तन कर खड़े हो जाते. दरअसल उसे अपने उन्मुक्त उरोजों को किसी मर्यादा में बाँध कर रखना कभी नही सुहाया और ना ही उनको चुन्नी से पर्दे में रखना. मौका मिलते ही ब्रा को जानबूझ कर बाथरूम की खूँटी पर ही टाँग जाती और मनचले लड़कों को अपने इर्द गिर्द मंडराते देख मज़े लेती.. अक्सर जान बूझ अपने हाथ ऊपर उठा अंगड़ाई सी लेती और बेल तन कर झूलने से लगते, उस वक़्त मोना के सामने खड़े लड़कों की हालत खराब हो जाती... कुछ तो अपने होंटो पर ऐसे जीभ फेरने लगते मानो मौका मिलते ही मुँह मार देंगे.




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03-30-2013, 07:25 AM
Post: #2
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
उसे पूरी उम्मीद थी तरुन पढ़ाने ज़रूर आयेगा । इसीलिए रगड़ रगड़ कर नहाते हुए मोना ने खेत की मिट्टी अपने बदन से उतारी और नयी नवेली कच्छी पहन ली जो उसकी मम्मी 2-4 दिन पहले ही बाजार से लाई थी," पता नही मोना! तेरी उमर में तो मैं कच्छी पहनती भी नही थी. तेरी इतनी जल्दी कैसे खराब हो जाती है" उसकी मम्मी ने लाकर देते हुए कहा था. मोना ने स्कूल वाली स्कर्ट डाली और बिना ब्रा के शर्ट पहन कर बाथरूम से बाहर आ गयी. “निकम्मी! ये हिलते हैं तो तुझे शर्म नही आती?" उसकी मम्मी की इस बात को मोना ने नज़रअंदाज किया और अपना बैग उठा सीढ़ियों से नीचे उतरती चली गयी. लड़के ने घर में घुस कर आवाज़ दी. उसे पता था कि घर में कोई नही है. फिर भी वो कुछ ना बोली. दर-असल पढ़ने का मन था ही नही, इसीलिए सोने का बहाना किए पड़ी रही. मोना के पास आते ही वो फिर बोला "मोना!" उसने 2-3 बार आवाज़ दी. पर उसे नही उठना था सो नही उठी. हाए ऱाम! वो तो अगले ही पल लड़कों वाली औकात पर आ गया. सीधा नितंबों पर हाथ लगाकर हिलाया,"मोना.. उठो ना! पढ़ना नही है क्या?"

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03-30-2013, 07:25 AM
Post: #3
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
बेशर्मी से वो चारपाई पर उसके सामने पसर गयी और एक टाँग सीधी किए हुए दूसरी घुटने से मोड़ अपनी छाती से लगा ली. सीधी टाँग वाली चिकनी जाँघ तो उसे ऊपर से ही दिखाई दे रही थी.. उसको क्या क्या दिख रहा होगा, आप खुद ही सोच लो. "ठीक से बैठ जा! अब पढ़ना शुरू करेंगे.. " हरामी ने मोना की जन्नत की ओर देखा तक नही। एक डेढ़ घंटे में जाने कितने ही सवाल निकाल दिए उसने, मोना की समझ में तो खाक भी नही आया.. कभी उसके चेहरे पर मुस्कुराहट को कभी उसकी पॅंट के मर्दाने उभार को देखती रही। पढ़ते हुए उसका ध्यान एक दो बार मोना की चूचियो की और हुआ तो उसे लगा कि वो 'उभारों' का दीवाना है. मोना ने झट से उसकी सुनते सुनते अपनी शर्ट का बीच वाला एक बटन खोल दिया. मोना की गदराई हुई चूचियाँ, जो शर्ट में घुटन महसूस कर रही थी; रास्ता मिलते ही सरक कर साँस लेने के लिए बाहर झाँकने लगी.. दोनो में बाहर निकलने की मची होड़ का फायदा उनके बीच की गहरी घाटी को हो रहा था, और वह बिल्कुल सामने थी. तरुण ने जैसे ही इस बार उससे पूछने के लिए मोना की और देखा तो उसका चेहरा एकदम लाल हो गया.. हड़बड़ाते हुए उसने कहा," बस! आज इतना ही.. वो थक जाने का अभिनय कर के लेट गई। वो एक बार बाहर की तरफ़ गया मोना समझी कमबखत सारी मेहनत को मिट्टी में मिला के जा रहा है । पर वो बाहर नज़र मार कर वापस आ ग़या और मोना के नितंबों से थोड़ा नीचे उससे सटकर चारपाई पर ही बैठ गया. वो मुँह नीचे किताब पर देख रही थी पर उसे यकीन था कि वो चोरी चोरी मोना के बदन की मांसल बनावट का ही लुत्फ़ उठा रहा होगा! "मोना!"

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03-30-2013, 07:25 AM
Post: #4
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
इस बार थोड़ी तेज बोलते हुए उसने मोना के घुटनों तक के लहँगे से नीचे मोना की नंगी गुदाज पिंडलियों पर हाथ रखकर उसे हिलाया और सरकते हुए अपना हाथ मोना के घुटनो तक ले गया. अब उसका हाथ नीचे और लहंगा ऊपर था. उससे अब सहन करना मुश्किल हो रहा था. पर शिकार हाथ से निकलने का डर था. चुप्पी साधे उसको जल्द से जल्द अपने पिंजरे में लाने के लिए दूसरी टाँग घुटनो से मोड़ और अपने पेट से चिपका ली. इसके साथ ही स्कर्ट ऊपर सरकता गया और मोना की एक जाँघ काफ़ी ऊपर तक नंगी हो गयी. मोना ने देखा नही, पर मोना की कच्छी तक आ रही बाहर की ठंडी हवा से उसे लग रहा था कि उसको मोना की कच्छी का रंग दिखने लगा है. "मोना" इस बार उसकी आवाज़ में कंपकपाहट सी थी.. वो शायद! एक बार खड़ा हुआ और फिर बैठ गया.. शायद स्कर्ट उसके नीचे फँसा हुआ होगा. वापस बैठते ही उसने स्कर्ट को ऊपर पलट कर मोना की कमर पर डाल दिया.. उसका क्या हाल हुआ होगा ये तो पता नही. पर मोना की बुर में बुलबुले से उठने शुरू हो चुके थे. जब सहन करने की हद पार हो गयी तो अपना हाथ मूडी हुई टाँग के नीचे से ले जाकर अपनी कच्छी में उंगलियाँ डाल 'वहाँ' खुजली करने करने के बहाने उसको कुरेदने लगी. मोना का ये हाल था तो उसका क्या हो रहा होगा? सुलग गया होगा ना?

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03-30-2013, 07:25 AM
Post: #5
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
मोना ने हाथ वापस खींचा तो अहसास हुआ जैसे मोना की बुर की एक फाँक कच्छी से बाहर ही रह गयी है. वो तो मोना की उम्मीद से भी ज़्यादा शातिर निकला. अपना हाथ स्कर्ट के नीचे सरकते हुए मोना के चूतड़ों पर ले गया.... कच्छी के ऊपर थिरकती हुई उसकी उंगलियों ने तो मोना की जान ही निकल दी. कसे हुए मोना के चिकने चूतड़ों पर धीरे धीरे मंडराता हुआ उसका हाथ कभी 'इसको' कभी उसको दबा कर देखता रहा. मोना की चूचियाँ चारपाई में दबकर छॅट्पटेने लगी थी. मोना ने बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू पाया हुआ था.. अचानक उसने मोना के स्कर्ट को वापस ऊपर उठाया और धीरे से अपनी एक उंगली कच्छी में डाल दी.. धीरे धीरे उंगली सरकती हुई पहले नितंबों की दरार में घूमी और फिर नीचे आने लगी.. मोना ने दम साध रखा था.. पर जैसे ही उंगली मोना की 'फूल्कुन्वरि' की फांकों के बीच आई; वो उच्छल पड़ी.. और उसी पल उसका हाथ वहाँ से हटा और चारपाई का बोझ कम हो गया.. मोना की छोटी सी मछ्ली तड़प उठी. उसे फ़िर लगा, मौका हाथ से गया.. पर इतनी आसानी से वो भी हार मान'ने वालों में से नही हूँ... सीधी हो मोना ने अपनी जांघें घुटनों से पूरी तरह मोड़ कर एक दूसरी से विपरीत दिशा में फैला दी. अब स्कर्ट मोना के घुटनो से ऊपर था और उसे विश्वास था कि मोना की भीगी हुई कच्छी के अंदर बैठी 'छम्मक छल्लो' ठीक उसके सामने होगी. थोड़ी देर और यूँही बड़बड़ाते हुए मैं चुप हो कर पढ़ने का नाटक करने लगी. अचानक उसे कमरे की चिट्कनी बंद होने की आवाज़ आई. अगले ही पल वह वापस चारपाई पर ही आकर बैठ गया.. धीरे धीरे फिर से रेंगता हुआ उसका हाथ वहीं पहुँच गया. मोना की चूत के ऊपर से उसने कच्छी को सरककर एक तरफ कर दिया. मोना ने हल्की सी आँखें खोलकर देखा. उसने चस्मा नही पहना हुआ था. शायद उतार कर एक तरफ रख दिया होगा. वह आँखें फ़ाड़ मोना की फड़कती हुई बुर को ही देख रहा था. उसके चेहरे पर उत्तेजना के भाव अलग ही नज़र आ रहे थे..

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03-30-2013, 07:25 AM
Post: #6
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
अचानक उसने अपना चेहरा उठाया तो मोना ने अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर ली. उसके बाद तो उसने उसे हवा में ही उड़ा दिया. चूत की दोनो फांकों पर उसे उसके दोनो हाथ महसूस हुए. बहुत ही करीब उसने अपने अंगूठे और उंगलियों से पकड़ कर मोटी मोटी फांकों को एक दूसरी से अलग कर दिया. जाने क्या ढूँढ रहा था वह अंदर. पर जो कुछ भी कर रहा था, उससे सहन नही हुआ और मोना ने काँपते हुए जांघें भींच कर अपना पानी छोड़ दिया.. पर आश्चर्यजनक ढंग से इस बार उसने अपने हाथ नही हटाए... किसी कपड़े से (शायद मोना के स्कर्ट से ही) उसने चूत को साफ़ किया और फिर से मोना की चूत को चौड़ा कर लिया. पर अब झाड़ जाने की वजह से उसे नॉर्मल रहने में कोई खास दिक्कत नही हो रही थी. हाँ, मज़ा अब भी आ रहा था और मैं पूरा मज़ा लेना चाहती थी.

अगले ही पल उसे गरम साँसें चूत में घुसती हुई महसूस हुई और पागल सी होकर मोना ने वहाँ से अपने आपको उठा लिया.. मोना ने अपनी आँखें खोल कर देखा. उसका चेहरा मोना की चूत पर झुका हुआ था.. मैं अंदाज़ा लगा ही रही थी कि उसे पता चल गया कि वो क्या करना चाहता है. अचानक वो मोना की चूत को अपनी जीभ से चाटने लगा.. मोना के सारे बदन में झुरझुरी सी उठ गयी..इस आनंद को सहन ना कर पाने के कारण मोना की सिसकी निकल गयी और मैं अपने नितंबों को उठा उठा कर पटक'ने लगी...पर अब वो डर नही रहा था... मोना की जांघों को उसने कसकर एक जगह दबोच लिया और मोना की चूत के अंदर जीभ डाल दी.. "अयाया!" बहुत देर से दबाए रखा था इस सिसकी को.. अब दबी ना रह सकी.. मज़ा इतना आ रहा था की क्या बताउ... सहन ना कर पाने के कारण मोना ने अपना हाथ वहाँ ले जाकर उसको वहाँ से हटाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया," कुछ नही होता मोना.. बस दो मिनिट और!" कहकर उसने मोना की जांघों को मोना के चेहरे की तरफ धकेल कर वहीं दबोच लिया और फिर से जीभ के साथ मोना की चूत की गहराई मापने लगा...

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03-30-2013, 07:25 AM
Post: #7
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
फिर क्या था.. उसने चेहरा ऊपर करके मुस्कुराते हुए मोना की और देखा.. उसका उतावलापन देख तो मोना की हँसी छूट गयी.. इस हँसी ने उसकी झिझक और भी खोल दी.. झट से उसे पकड़ कर नीचे उतारा और घुटने ज़मीन पर टिका उसे कमर से ऊपर चारपाई पर लिटा दिया..," ये क्या कर रहे हो?" "टाइम नही है अभी बताने का.. बाद में सब बता दूँगा.. कितनी रसीली है तू हाए.. अपने चूतड़ थोड़ा ऊपर कर ले.." "पर कैसे करूँ?.. दर असल मोना के तो घुटने ज़मीन पर टिके हुए थे "तू भी ना.. !" उसको गुस्सा सा आया और मोना की एक टाँग चारपाई के ऊपर चढ़ा दी.. नीचे तकिया रखा और उसे अपना पेट वहाँ टिका लेने को बोला.. मोना ने वैसा ही किया.. "अब उठाओ अपने चूतड़ ऊपर.. जल्दी करो.." बोलते हुए उसने अपना मूसल जैसा लण्ड पॅंट में से निकाल लिया.. मोना अपने नितंबों को ऊपर उठाते हुए अपनी चूत को उसके सामने परोसा । तभी दरवाजे पे दस्तक हुई और उसने नज़रें चुराकर एक बार और मोना की गोरी चूचियो को देखा और खड़ा हो गया.... उसकी मम्मी अन्दर आई और उसे साथ ले गईं।

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03-30-2013, 07:26 AM
Post: #8
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
मोना कमरे से बाहर आयी । मम्मी के कमरे के पास से निकलते हुए उसने अन्दर से आती आवाज सुनी- "तुमने दरवाजे पर दस्तक दे कर सब गड़बड़ की है इसे अब तुम ही निबटाओ। 15 मिनिट से ज़्यादा नही लगाऊँगा..... मान भी जा चाची अब.... मोना ने झाँका भ्रम टूट गया.. नीचे अंधेरा था.. पर बाहर स्ट्रीट लाइट होने के कारण धुँधला धुँधला दिखाई दे रहा था... "पापा तो इतने लंबे हैं ही नही..!" मोना ने मॅन ही मॅन सोचा... वो उसकी मम्मी को दीवार से चिपकाए उस'से सटकार खड़ा था.. उसकी मम्मी अपना मौन विरोध अपने हाथों से उसको पिछे धकेलने की कोशिश करके जाता रही थी... "देख चाची.. उस दिन भी तूने उसे ऐसे ही टरका दिया था.. मैं आज बड़ी उम्मीद के साथ आया हूँ... आज तो तुझे देनी ही पड़ेगी..!" वो बोला..... "तुम पागल हो गये हो क्या तरुन? ये भी कोई टाइम है...तेरा चाचा जान से मार देगा..... तुम जल्दी से 'वो' काम बोलो जिसके लिए तुम्हे इस वक़्त आना ज़रूरी था.. और जाओ यहाँ से...!" उसकी मम्मी फुसफुसाई... "काम बोलने का नही.. करने का है चाची.. इस्शह.." सिसकी सी लेकर वो वापस उसकी मम्मी से चिपक गया... "नही.. जाओ यहाँ से... अपने साथ उसे भी मरवाओगे..." उसकी मम्मी की खुस्फुसाहट भी उनकी सुरीली आवाज़ के कारण साफ़ समझ में आ रही थी.... "वो लुडरू मेरा क्या बिगाड़ लेगा... तुम तो वैसे भी मरोगी अगर आज मेरा काम नही करवाया तो... मैं कल चाचाको बता दूँगा की मैने तुम्हे बाजरे वाले खेत में अनिल के साथ पकड़ा था...." तरुन हँसने लगा.... "मैं... मैं मना तो नही कर रही तरुन... कर लूँगी.. पर यहाँ कैसे करूँ... तेरी दादी लेटी हुई है... उठ गयी तो?" उसकी मम्मी ने घिघियाते हुए विरोध करना छोड़ दिया.... "क्या बात कर रही हो चाची? इस बुधिया को तो दिन में भी दिखाई सुनाई नही देता कुछ.. अब अंधेरे में इसको क्या पता लगेगा..." तरुन सच कर रहा था.... "पर छोटी भी तो यहीं है... मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ..." मोना की मम्मी गिड़गिडाई...

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03-30-2013, 07:26 AM
Post: #9
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
" आज तो वो ये सुपाड़ा ले के बड़ी हो गई होती अगर तुम गड़बड़ न करतीं..... किसी को नही बताएगी... अब देर मत करो.. जितनी देर करोगी.. तुम्हारा ही नुकसान होगा... मेरा तो खड़े खड़े ही निकलने वाला है... अगर एक बार निकल गया तो आधे पौने घंटे से पहले नही छूटेगा.. पहले बता रहा हूँ..." "तुम परसों खेत में आ जाना.. तेरे चाचा को शहर जाना है... मैं अकेली ही जाउन्गी.. समझने की कोशिश करो तरुन..मैं कहीं भागी तो नही जा रही....."उसकी मम्मी ने फिर उसको समझाने की कोशिश की....

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03-30-2013, 07:26 AM
Post: #10
RE: मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
" तुम्हे मैं ही मिला हूँ क्या? चूतिया बनाने के लिए... बल्लू बता रहा था कि उसने तुम्हारी उसके बाद भी 2 बार मारी है... और मुझे हर बार टरका देती हो... परसों की परसों देखेंगे.... अब तो मोना के लिए तो एक एक पल काटना मुश्किल हो रहा है.. तुम्हे नही पता चाची.. तुम्हारे भारी चूतड़ देख देख कर ही जवान हुआ हूँ.. हमेशा से सपना देखता था कि किसी दिन तुम्हारी चिकनी जांघों को सहलाते हुए तुम्हारी रसीली चूत चाटने का मौका मिले.. और तुम्हारे मोटे मोटे चूतड़ों की कसावट को मसलता हुआ तुम्हारी चूत में उंगली डाल कर देखूं.. सच कहता हूँ, आज अगर तुमने मुझे अपनी मारने से रोका तो या तो मैं नही रहूँगा... या तुम नही रहोगी.. लो पकड़ो इस्सको..." उनकी हरकतें इतनी साफ़ दिखाई नही दे रही थी... पर ये ज़रूर साफ़ दिख रहा था कि दोनो आपस में गुत्थम गुत्था हैं... मैं आँखें फ़ाडे ज़्यादा से ज़्यादा देखने की कोशिश करती रही.... "ये तो बहुत बड़ा है... मैंने तो आज तक किसी का ऐसा नही देखा...." उसकी मम्मी ने कहा.... "बड़ा है चाची तभी तो तुम्हे ज़्यादा मज़ा आएगा... चिंता ना करो.. मैं इस तरह करूँगा कि तुम्हे सारी उमर याद रहेगा... वैसे चाचा का कितना है?" तरुन ने खुश होकर कहा.. वह पलट कर खुद दीवार से लग गया था और मोना की मम्मी की कमर उसकी तरफ कर दी थी........ "धीरे बोलो......" उसकी मम्मी उसके आगे घुटनो के बल बैठ गयी... और कुछ देर बाद बोली," उनका तो पूरा खड़ा होने पर भी इस'से आधा रहता है.. सच बताउ? उनका आज तक मेरी चूत के अंदर नही झड़ा..." मोना की मम्मी भी उसकी तरह गंदी गंदी बातें करने लगी.. वो हैरान थी.. पर उसे मज़ा आ रहा था..

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