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कामांजलि
10-02-2010, 12:14 PM
Post: #31
RE: कामांजलि
"इसीलिए तो कह रहा हूँ.. जल्दी बताओ क्या बात है..?" तरुण ने मुझे कहा और मुझे अपनी और हल्का सा खींचते हुए बोला," अगर ज्यादा ठंड लग रही है तो मेरे सीने से लग जाओ आकर.. ठंड कम हो जायेगी.. ही ही" उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी सीधे सीधे मुझे अपने से चिपकाने की....

"सच!" मैंने पूछा.. अँधेरे में कुछ दिखाई तो दे नहीं रहा था.. बस आवाज से ही एक दूसरे की मंशा पता चल रही थी....

"और नहीं तो क्या? देखो!" तरुण ने कहा और मुझे खींच कर अपनी छाती से चिपका लिया... मुझे बहुत मजा आने लगा.. सच कहूँ, तो एकदम से अगर मैं अपनी बात कह देती और वो तैयार हो भी जाता तो इतना मजा नहीं आता जितना अब धीरे धीरे आगे बढ़ने में आ रहा था.....

मैंने अपने गाल उसकी छाती से सटा लिया.. और उसकी कमर में हाथ डाल लिया.. वो मेरे बालों में प्यार से हाथ फेरने लगा.... मेरी छातियाँ ठंड और उसके सीने से मिल रही गर्मी के मारे पागल सी हुई जा रही थी.....

"ठंड कम हुई न अंजु?" मेरे बालों में हाथ फेरते हुए वह अचानक अपने हाथ को मेरी कमर पर ले गया और मुझे और सख्ती से भींच लिया....
मैंने 'हाँ' में अपना सर हिलाया और उसके साथ चिपकने में अपनी रजामंदी प्रकट करने के लिये थोड़ी सी और उसके अंदर सिमट गयी.. अब मुझे अपने पेट पर कुछ चुभता हुआ सा महसूस होने लगा.. मैंने जाना गयी.. यह उसका लंड था!

"तुम कुछ बता रही थी न अंजु? तरुण मेरी नाजुक कमर पर अपना हाथ उपर नीचे फिसलाते हुए बोला.....

"हम्म्म्म.. पर पहले तुम बताओ!" मैं अपनी जिद पर अड़ी रही.. वरना मुझे विश्वास तो था ही.. जिस तरीके से उसके लंड ने अपना 'फन' उठान चालु किया था.. थोड़ी देर में वो 'अपने' आप ही चालु हो जायेगा....

"तुम बहुत जिददी हो..." वह अपने हाथ को बिल्कुल मेरे चूतड़ों की दरार के नजदीक ले गया और फिर वापस खींच लिया....," मैं कह रहा था की... सुन रही हो न?"

"हम्म्म्म" मैंने जवाब दिया.. उसके लंड की चुभन मेरे पेट के पास लगातार बढ़ती जा रही थी.... मैं बेकरार थी.. पर फिर भी.. मैं इंतज़ार कर रही थी...

"मैं कह रहा था की... पूरे शहर और पूरे गाँव में तुम जैसी सुन्दर लड़की मैंने कोई और नहीं देखी.." तरुण बोला...

मैंने झट से शरारत भरे लहजे में कहा," मीनू दीदी भी तो बहुत सुन्दर है न?"

एक पल को मुझे लगा.. मैंने गलत ही जिकर किया.. मीनू का नाम लेते ही उसके लंड की चुभन ऐसे गायब हुई जैसे किसी गुब्बारे की हवा निकल गयी हो...

"छोडो न! किसका नाम ले रही हो..! होगी सुन्दर.. पर तुम्हारे जितनी नहीं है.. अब तुम बताओ.. तुम क्या कह रही थी...?" तरुण ने कुछ देर रुक कर जवाब दिया....

मैं कुछ देर सोचती रही की कैसे बात शुरू करूँ.. फिर अचानक मेरे मन में जाने ये क्या आया," कुछ दिनों से जाने क्यूँ मुझे अजीब सा लगता है.. आपको देखते ही उस दिन पता नहीं क्या हो गया था मुझे?"
"क्या हो गया था?" तरुण ने प्यार से मेरे गालों को सहलाते हुए पूछा....

"पता नहीं... वही तो जानना चाहती हूँ..." मैंने जवाब दिया...

"अच्छा.. मैं कैसा लगता हूँ तुम्हे.. पहले बताओ!" तरुण ने मेरे माथे को चूम कर पूछा.. मेरे बदन में गुदगुदी सी हुई.. मुझे बहुत अच्छा लगा....

"बहुत अच्छे!" मैंने सिसक कर कहा और उसके और अंदर घुस गयी.. सिमट कर!

"अच्छे मतलब? क्या दिल करता है मुझे देख कर?" तरुण ने प्यार से पूछा और फिर मेरी कमर पर धीरे धीरे अपना हाथ नीचे ले जाने लगा...

"दिल करता है की यूँही खड़ी रहूँ.. आपसे चिपक कर.." मैंने शर्माने का नाटक किया...

"बस! यही दिल करता है या कुछ और भी.. " उसने कहा और हँसने लगा...

"पता नहीं.. पर तुमसे दूर जाते हुए दुःख होता है.." मैंने जवाब दिया....

"ओहहो... इसका मतलब तुम्हे मुझसे प्यार हो गया है.." तरुण ने मुझे थोड़ा सा ढीला छोड़ कर कहा....

"वो कैसे...?" मैंने भोलेपन से कहा....

"यही तो होता है प्यार.. हमें पता नहीं चलता की कब प्यार हो गया है.. कोई और भी लगता है क्या.. मेरी तरह अच्छा...!" तरुण ने पूछा....

सवाल पूछते हुए पता नहीं क्लास के कितने लड़कों की तस्वीर मेरे जहन में कौंध गयी.. पर प्रत्यक्ष में मैंने सिर्फ इतना ही कहा," नहीं!"

"हम्म्म्म.. एक और काम करके देखें.. फिर पक्का हो जायेगा की तुम्हे मुझसे प्यार है की नहीं..." तरुण ने मेरी थोड़ी के नीचे हाथ लेजाकर उसको उपर उठा लिया....

"साला पक्का लड्कीबाज़ लगता था... इस तरह से दिखा रहा था मानों.. सिर्फ मेरी प्रॉब्लम सोल्व करने की कोशिश कर रहा हो.. पर मैं नाटक करती रही.. शराफत और नजाकत का," हम्म्म्म!"

"अपने होंठों को मेरे होंठों पर रख दो...!" उसने कहा...

"क्या?" मैंने चौंक कर हडबडाने का नाटक किया...

"हे भगवान.. तुम तो बुरा मान रही हो.. उसके बिना पता कैसे चलेगा...!" तरुण ने कहा...

"अच्छा लाओ!" मैंने कहा और अपना चेहरा उपर उठा लिया....

तरुण ने झुक कर मेरे नर्म होंठों पर अपने गरम गरम होंठ रख दिये.. मेरे शरीर में अचानक अकडन सी शुरू हो गयी.. उसके होंठ बहुत प्यारे लग रहे थे मुझे.. कुछ देर बाद उसने अपने होंठों का दबाव बढाया तो मेरे होंठ अपने आप खुल गये... उसने मेरे उपर वाले होंठ को अपने होंठों के बीच दबा लिया और चूसने लगा.. मैं भी वैसा ही करने लगी, उसके नीचे वाले होंठ के साथ....

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10-02-2010, 12:15 PM
Post: #32
RE: कामांजलि
अँधेरे में मुझे मेरी बंद आँखों के सामने तारे से टूटते नजर आ रहे थे... कुछ ही देर में बदहवासी में मैं पागल सी हो गयी और तेज तेज साँसे लेने लगी.. उसका भी कुछ ऐसा ही हाल था.. उसका लंड एक बार फिर अकड़ कर मेरे पेट में घुसने की कोशिश करने लगा था.. थोड़ी देर बाद ही मुझे मेरी कच्छी गीली होने का अहसास हुआ.... मेरी छातियाँ मचलने सी लगी थी... उनका मचलना शांत करने के लिये मैंने अपनी छातियाँ तरुण के सीने में गड़ा दी..

मुझसे रहा न गया.... मैंने अपने पेट में गड़ा हुआ उसका लंड अपने हाथों में पकड़ लिया और अपने होंठ छुड़ाकर बोली," ये क्या है?"
उसने लंड के उपर रखा मेरा हाथ वहीं पकड़ लिया,"ये! तुम्हे सच में नहीं पता क्या?"

मुझे पता तो सब कुछ था ही.. उसके पूछने के अंदाज से मुझे लगा की नाटक कुछ ज्यादा ही हो गया.. मैंने शर्मा कर अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की.. और छुड़ा भी लिया," ओह्ह.. मुझे लगा ये और कुछ होगा.. पर ये तो बहुत बड़ा है.. और ये..इस तरह खड़ा क्यूँ है?" मैंने मचलते हुए कहा...

"क्योंकि तुम मेरे पास खड़ी हो.. इसीलिए खड़ा है.." वह हँसने लगा..," सच बताना! तुमने किसी का देखा नहीं है क्या? तुम्हे मेरी कसम!"

मेरी आँखों के सामने सुन्दर का लंड दौड़ गया.. वो उसके लंड से तो बड़ा ही था.. पर मैंने तरुण की कसम की परवाह नहीं की," हाँ.. देखा है.. पर इतना बड़ा नहीं देखा.. छोटे छोटे बच्चों का देखा है..." मैंने कहा और शर्मा कर उसकी कमर में हाथ डाल कर उससे चिपक गयी....

"दिखाऊँ?" उसने गरम गरम साँसे मेरे चेहरे पर छोड़ते हुए धीरे से कहा...

"पर.. यहाँ कैसे देखूंगी..? यहाँ तो बिल्कुल अँधेरा है.." मैंने भोलेपन से कहा...

"अभी हाथ में लेकर देख लो.. मैं बाहर निकल देता हूँ.. फिर कभी आँखों से देख लेना!" तरुण ने मेरा हाथ अपनी कमर से खींच कर वापस अपने लंड पर रख दिया....

मैं लंड को हाथ में पकड़े खड़ी रही," नहीं.. मुझे शर्म आ रही है... ये कोई पकड़ने की चीज है....!"

"अरे, तुम तो बहुत भोली निकली.. मैं तो जाने क्या क्या सोच रहा था.. यही तो असली चीज होती है लड़की के लिये.. इसके बिना तो लड़की का गुज़ारा ही नहीं हो सकता!" तरुण मेरी बातों में आकर मुझे निरी नादान समझने लगा था....

"वो क्यूँ?" लड़की का भला इसके बिना गुज़ारा क्यूँ नहीं हो सकता.. लड़कियों के पास ये कहाँ से आयेगा.. ये तो सिर्फ लड़कों के पास ही होता है न!" मैंने नाटक जारी रखा.. इस नाटक में मुझे बहुत मजा आ रहा था.. उपर बैठा भगवान भी; जिसने मुझे इतनी कामुक और गरम चीज बनाया.. मेरी एक्टिंग देख कर दातों तले ऊँगली दबा रहा होगा.....

"हाँ.. लड़कों के पास ही होता है ये बस! और लड़के ही लड़कियों को देते हैं ये.. तभी तो प्यार होता है..." तरुण ने झुक कर एक बार मेरे होंठों को चूस लिया और वापस खड़ा हो गया... मुझ जैसी लड़की को अपने जाल में फंसा हुआ देख कर उसका लंड रह रह कर झटके से खा रहा था.. मेरे हाथ में.....," और बदले में लड़कियां लड़कों को देती हैं...." उसने बात पूरी की....

"अच्छा! क्या? ... लड़कियां क्या देती हैं बदले में..." मेरी चूत से टप टप पानी टपक रहा था....

"बता दूँ?" तरुण ने मुझे अपने से चिपकाये हुए ही अपना हाथ नीचे करके मेरे मस्त सुडोल चूतड़ों पर फेरने लगा.....

मुझे चूत में थोड़ी और कसमसाहट सी महसूस होने लगी.. उत्तेजना में मैंने उसका लंड और कसकर अपनी मुठ्ठी में भींच लिया......," हाँ.. बता दो!" मैंने हौले से कहा....

"अपनी चूत!" वह मेरे कान में फुसफुसाया था.. पर हवा जाकर मेरी चूत में लगी..,"आअह.." मैं मचल उठी.....

"नईई..." मैंने बडबडाते हुए कहा....

"हाँ.. सच्ची अंजु...! लड़कियां अपनी चूत देती हैं लड़कों को और लड़के अपना..." अचानक वह रुक गया और मुझसे पूछने लगा," इसको पता है क्या कहते हैं?"

"मैंने शर्माकर कहा," हाँ... लुल्ली" और हँसने लगी...

"पागल.. लुल्ली इसको थोड़े ही कहते हैं.. लुल्ली तो छोटे बच्चों की होती है.. बड़ा होने पर इसको 'लंड' बोलते हैं... और लोउड़ा भी..!" उसने मेरे सामान्य ज्ञान में वृद्धि करनी चाही.. पर उस लल्लू से ज्यादा तो इसके नाम मुझे ही पता थे..

"पर.. ये लेने देने वाली क्या बात है.. मेरी समझ में नहीं आई...!" मैंने अनजान सी बनते हुए उसको काम की बात पर लाने की कोशिश की....

"तुम तो बहुत नादान हो अंजु.. मुझे कितनो दिनों से तुम जैसी प्यारी सी, भोली सी लड़की की तलाश थी.. मैं सच में तुमसे बहुत प्यार करने लगा हूँ... पर मुझे डर है की तुम इतनी नादान हो.. कहीं किसी को बता न दो ये बातें.. पहले कसम खाओ की किसी से अपनी बातों का जिकर नहीं करोगी..." तरुण ने कहा...

"नहीं करूँगी किसी से भी जिकर... तुम्हारी कसम!" मैंने झट से कसम खा ली...

"आई लव यू जान!" उसने कहा," अब सुनो... देखो.. जिस तरह तुम्हारे पास आते ही मेरे लौड़े को पता लग गया और ये खड़ा हो गया; उसी तरह.. मेरे पास आने से तुम्हारी चूत भी फूल गयी होगी.. और गीली हो गयी होगी... है न.. सच बताना..."

वो बातें इतने कामुक ढंग से कर रहा था की मेरा भी मेरी चूत का 'देसी' नाम लेने का दिल कर गया.. पर मैंने बोलते हुए अपना भोलापन नहीं खोया," फूलने का तो पता नहीं... पर गीली हो गयी है मेरी चू च च ...."

"अरे.. शर्मा क्यूँ रही हो मेरी जान.. शर्माने से थोड़े ही काम चलेगा... इसका पूरा नाम लो..." उसने मेरी छातीयों को दबाते हुए कहा.. मेरी सिसकी निकल गयी..

"आह.. चूत.." मैंने नाम ले दिया.. थोड़ा शर्माते हुए....

"वैरी गुड... अब इसका नाम लो.. शाबाश!" तरुण मेरी छातीयों को मेरे कमीज के उपर से मसलने लगा.. मैं मदहोश होती जा रही थी...

मैंने उसका लंड पकड़ कर नीचे दबा दिया," लौड़ा.. आअह!"
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10-02-2010, 12:15 PM
Post: #33
RE: कामांजलि
"यही तड़प तो हमें एक दूसरे के करीब लाई है जाना.. हाँ.. अब सुनो.. मेरा लौड़ा और तुम्हारी चूत.. एक दुसरे के लिये ही बने हैं... इसीलिए एक दुसरे को पास पास पाकर मचल गये... दरअसल.. मेरा लौड़ा तुम्हारी चूत में घुसेगा तो ही इनका मिलन होगा... ये दोनों एक दूसरे के प्यासे हैं.. इसी को 'प्यार' कहते हैं मेरी जान.... अब बोलो.. मुझसे प्यार करना है...?" उसने कहते हुए अपना हाथ पीछे ले जाकर सलवार के उपर से ही मेरे मस्त चूतड़ों की दरार में घुसा दिया.. मैं पागल सी होकर उसमे घुसने की कोशिश करने लगी....

"बोलो न.. मुझसे प्यार करती हो तो बोलो.. प्यार करना है की नहीं..." तरुण भी बेकरार होता जा रहा था....

"पर.. तुम्हारा इतना मोटा लौड़ा मेरी छोटी सी चूत में कैसे घुसेगा.. ये तो घुस ही नहीं सकता..." मैंने मचलते हुए शरारत से उसको थोड़ा और तड़पाया...

"अरे.. तुम तो पागलों जैसी बात कर रही हो... सबका तो घुसता है चूत में... तुम क्या ऐसे ही पैदा हो गयी.. तुम्हारे पापा ने भी तो तुम्हारी मम्मी की चूत में घुसाया होगा... पहले उनकी भी चूत छोटी ही होगी...." तरुण ने मुझे समझाने की कोशिश की....

सच कहूँ तो तरुण की सिर्फ यही बात थी जो मेरी समझ में नहीं आई थी...," क्या मतलब?"

"मतलब ये मेरी जाना.. की शादी के बाद जब पति अपनी पत्नी की चूत में लौड़ा घुसटा है तभी बच्चा पैदा होता है... बिना घुसाये नहीं होता... और इसमें मजा भी इतना आता है की पूछो ही मत...." तरुण अब उँगलियों को सलवार के उपर से ही मेरी चूत के उपर ले आया था और धीरे धीरे सहलाते मुझे तड़पाते हुए तैयार कर रहा था......

तैयार तो मैं कब से थी.. पर उसकी बात सुनकर मैं डर गयी.. मुझे लगा अगर मैंने अपनी चूत में उसका लंड घुसवा लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे... मुझे बच्चा हो जायेगा...," नहीं, मुझे नहीं घुसवाना!" मैं अचानक उससे अलग हट गयी....

"क्या हुआ? अब अचानक तुम यूँ पीछे क्यूँ हट रही हो...?" तरुण ने तड़प कर कहा......

"नहीं.. मुझे देर हो रही है.. चलो अब यहाँ से!" मैं हडबडाते हुए बोली....

"हे भगवान.. ये लड़कियां!" तरुण बडबडाया और बोला," कल करोगी न?"

"हाँ... अब जल्दी चलो.. मुझे घर पर छोड़ दो..." मैं डरी हुई थी कहीं वो जबरदस्ती न घुसा दे और मैं माँ न बन जाऊं!

"दो.. मिनट तो रुक सकती हो न.. मेरे लौड़े को तो शांत करने दो..." तरुण ने रीकुएस्ट सी करी....

मैं कुछ न बोली.. चुपचाप खड़ी रही...

तरुण मेरे पास आकर खड़ा हो गया और मेरे हाथ में 'टेस्ट्स' पकड़ा दिये," इन्हें आराम से सहलाती रहो..." कहकर वो तेजी से अपने हाथ को लंड पर आगे पीछे करने लगा.....

ऐसा करते हुए ही उसने मेरी कमीज में हाथ डाला और शमीज के उपर से ही मेरी छातीयों को दबाने लगा... मैं तड़प रही थी.. लंड को अपनी चूत में घुसवाने के लिये.. पर मुझे डर लग रहा था..

अचानक उसने छातीयों से हाथ निकल कर मेरे बालों को पकड़ा और मुझे अपनी और खींच कर मेरे होंठों में अपनी जीभ घुसा दी... और अगले ही पल झटके से खाता हुआ मुझसे दूर हट गया...

"चलो अब जल्दी... पर कल का अपना वादा याद रखना.. कल हम टयूशन से जल्दी निकल लेंगे...." तरुण ने कहा और हम दायें बायें देख कर रास्ते पर चल पड़े....

"कल भी दीदी को नहीं पढ़ाओगे क्या?" मैंने घर नजदीक आने पर पूछा....

"नहीं...!" उसने सपाट सा जवाब दिया....

"क्यूँ? मैंने अपने साथ रखी एक चाबी को दरवाजे के अंदर हाथ डाल कर ताला खोलते हुए पूछा.....

"तुमसे प्यार जो करना है..." वह मुस्कराया और वापस चला गया.....

मैं तो तड़प रही थी... अंदर जाते ही नीचे कमरे में घुसी और अपनी सलवार नीचे करके अपनी चूत को रगड़ने लगी....
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10-02-2010, 12:16 PM
Post: #34
RE: कामांजलि
अगले पूरे दिन मैं अजीब कशमकश में रही; जब मैं अपनी प्यासी चूत की आग भुझाने के लिये हर जगह हाथ पैर मार रही थी तो कोई नसीब ही नहीं हुआ.. और जब अच्छा खासा 'लल्लू' मेरे हाथों में आया तो मैं उसको अपनी चूत में घुसवाने से डरने लगी.. अब किसी से पूँछती भी तो क्या पूँछती? दीदी अपनी ससुराल में थी.. किसी और से पूछने की हिम्मत हो नहीं रही थी..

पूरा दिन मेरा दिमाग खराब रहा .. और टयूशन के टाइम भुझे मन से ही पिंकी के घर चली गयी...

उस दिन मीनू बहुत उदास थी, .. कारण मुझे अच्छी तरह पता था.. तरुण की नाराजगी ने उसको परेशान कर रखा था.. 2 दिन से उसने मीनू के साथ बात तक नहीं की थी...

"वो.. तरुण तुम्हे कहाँ तक छोड़ कर आया था कल?" मीनू ने मुझसे पूछा.. पिंकी साथ ही बैठी थी.. तरुण अभी आया नहीं था...

"मेरे घर तक.. और कहाँ छोड़ कर आता?" मैंने उसकी और देख कर कहा और उसका भुझा हुआ चेहरा देख बरबस ही मेरे होंठों पर मुस्कान तैर गयी...

"इतना खुश क्यूँ हो रही है? इसमें हँसने वाली बात क्या है?" मीनू ने चिढ़ कर कहा....

"अरे दीदी.. मैं आपकी बात पर थोड़े ही हँसी हूँ.. मैं तो बस यूँही..." मैं कहा और फिर मुस्करा दी...

"पिंकी.. पानी लाना उपर से...." मीनू ने कहा...

"जी, दीदी.. अभी लायी.. " कहकर पिंकी उपर चल दी...

"थोड़ा गरम करके लाना.. मेरा गला खराब है.." मीनू ने कहा और पिंकी के उपर जाते ही मुझे घूर कर बोली लगी," ज्यादा दांत निकलने की जरूरत नहीं है... मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ पता है.."

"अच्छा!" मैंने खड़ी होकर अंगडाई सी ली और अपने भरे भरे यौवन का जलवा उसको दिखा कर फिर मुस्कराने लगी.. मैं कुछ बोल कर उसको 'ठंडी' करने ही वाली थी की अचानक तरुण आ गया.. मैं मन की बात मन में ही रखे मुस्कराकर तरुण की और देखने लगी..

मीनू ने अपना सर झुका लिया और मुँह पर कपड़ा लपेट कर किताब में देखने लगी... तरुण मेरी और देख कर मुस्कराया और आँख मार दी.. मैं हँस पड़ी...

तरुण चारपाई पर जा बैठा. उसने रजाई अपने पैरों पर डाली और मुझे आँखों ही आँखों में उसी चारपाई पर बैठने का इशारा कर दिया...

वहाँ हर रोज पिंकी बैठी थी और मैं उसके सामने दूसरी चारपाई पर.. शायद तरुण मीनू को जलाने के लिये ऐसा कर रहा था.. मैं भी कहाँ पीछे रहने वाली थी.. मैंने एक नजर मीनू की और देखा और 'धम्म' से तरुण के साथ चारपाई पर बैठी और उसकी रजाई को ही दूसरी तरफ से अपनी टांगों पर खींच लिया....

मैंने मीनू की और तिरछी नजरों से देखा... वह हम दोनों को ही घूर रही थी... पर तरुण ने उसकी और ध्यान नहीं दिया....

तभी पिंकी नीचे आ गयी," नमस्ते भैया!" कहकर उसने मीनू को पानी का गिलास पकड़ाया.. मीनू ने पानी ज्यों का त्यों चारपाई के नीचे रख दिया....

पिंकी हमारे पास आई और हँसकर मुझसे बोली," ये तो मेरी सीट है..!"

"कोई बात नहीं पिंकी.. तुम यहाँ बैठ जाओ" तरुण ने उस जगह की और इशारा किया जहाँ पहले दिन से ही मैं बैठती थी....

"मैं तो ऐसे ही बता रही थी भैया.. यहाँ से तो और भी अच्छी तरह दिखाई देगा...." पिंकी ने हँसकर कहा और बैठ गयी....

उस दिन तरुण ने हमें आधा घंटा ही पढ़ाया और हमें कुछ याद करने को दे दिया..," मेरा कल एग्जाम है.. मुझे अपनी तैयारी करनी है.. मैं थोड़ी देर और यहाँ हूँ.. फिर मुझे जाना है.. तब तक कुछ पूछना हो तो पूछ लेना..." तरुण ने कहा और अपनी किताब खोल कर बैठ गया...

2 मिनट भी नहीं हुए होंगे.. अचानक मुझे अपने तलवों के पास तरुण का अँगूठा मंडराता हुआ महसूस हुआ.. मैंने नजरें उठाकर तरुण को देखा.. वह मुस्कराने लगा.. उसी पल मेरा ध्यान मीनू पर गया.. वह तरुण को ही देखे जा रही थी.. पर मेरे उसकी और देखने पर उसने अपना चेहरा झुका लिया..

मैंने भी नजरें किताब में झुका ली.. पर मेरा ध्यान तरुण के अँगूठे पर ही था.. अब वह लगातार मेरे टखनों के पास अपना अँगूठा सटाये हुए उसको आगे पीछे करके मुझे छेड रहा था...

अचानक रजाई के अंदर ही धीरे धीरे उसने अपनी टांग लंबी कर दी.. मैंने पिंकी को देखा और अपनी किताब थोड़ी उपर उठा ली....उसका पैर मेरी जाँघों पर आकर टिक गया...

मेरी चूत फुदकने लगी.. मुझ पर सुरूर सा छाने लगा और मैंने भी रजाई के अंदर अपनी टाँगे सीधी करके उसका पैर मेरी दोनों जांघों के बीच ले लिया... चोरी चोरी मिल रहे इस आनंद में पागल सी होकर मैंने उसके पैर को अपनी जाँघों में कसकर भींच लिया...

तरुण भी तैयार था.. शायद उसकी मंशा भी यही थी.. वह मुझे साथ लेकर निकलने से पहले ही मुझे पूरी तरह गरम कर लेना चाहता होगा.. उसने अपने पैर का पंजा सीधा किया और सलवार के उपर से ही मेरी कच्छी के किनारों को अपने अँगूठे से कुरेदने लगा.. चूत के इतने करीब 'घुसपैठिये' अँगूठे को महसूस करके मेरी सांसें तेज हो गयी.. बस 2 इंच का फासला ही तो बचा होगा मुश्किल से... मेरी चूत और उसके अँगूठे में...

मीनू और पिंकी के पास होने के कारण ही शायद हल्की छेड छाड से ही मिल रहे आनंद में दुगुनी कसक थी... मैं अपनी किताब को एक तरफ रख कर उसमे देखने लगी और मैंने अपने घुटने मोड़ कर रजाई को ऊँचा कर लिया.. अब रजाई के अंदर शैतानी कर रहे तरुण के पैरों की हलचल बाहर से दिखाई देनी बंद हो गयी...

अचानक तरुण ने अँगूठा सीधा मेरी चूत के उपर रख दिया.. मैं हडबड़ा सी गयी... चूत की फांकों के ठीक बीचों बीच उसका अँगूठा था और धीरे धीरे वो उसको उपर नीचे कर रहा था....
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10-02-2010, 12:16 PM
Post: #35
RE: कामांजलि
मैं तड़प उठी... इतना मजा तो मुझे जिंदगी में उस दिन से पहले कभी आया ही नहीं था.. शायद इसीलिए कहते हैं.. 'चोरी चोरी प्यार में है जो मजा' .. 2 चार बार अँगूठे के उपर नीचे होने से ही मेरी चूत छलक उठी.. चूतरस से मेरी कच्छी भी 'वहाँ' से पूरी तरह गीली हो गयी.... मुझे अपनी साँसों पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था.. मुझे लग रहा था की मेरे चेहरे के भावों से कम से कम मीनू तो मेरी हालत समझ ही गयी होगी...

'पर जो होगा देखा जायेगा' के अंदाज में मैंने अपना हाथ धीरे से अंदर किया और सलवार के उपर से ही अपनी कच्छी का किनारा पकड़ कर उसको अपनी चूत के उपर से हटा लिया.....

मेरा इरादा सिर्फ तरुण के अँगूठे को 'वहाँ' और अच्छी तरह महसूस करना था.. पर शायद तरुण गलत समझ गया.. चूत के उपर अब कच्छी की दीवार को न पाकर मेरी चूत का लिसलिसापन उसको अँगूठे से महसूस होने लगा.. कुछ देर वह अपने अँगूठे से मेरी फांकों को अलग अलग करने की कोशिश करता रहा.. मेरी हालत खराब होती जा रही थी.. आवेश में मैं कभी अपनी जाँघों को खोल देती और कभी भींच लेती... अचानक उसने मेरी चूत पर अँगूठे का दबाव एक दम बढ़ा दिया....

इसके साथ ही मैं हडबड़ा कर उछल सी पड़ी... और मेरी किताब छिटक कर नीचे जा गिरी... मेरी सलवार का कुछ हिस्सा मेरी चूत में ही फंसा रह गया..

"क्या हुआ अंजु!" पिंकी ने अचानक सर उठा कर पूछा....

"हाँ.. नहीं.. कुछ नहीं.. झपकी सी आ गयी थी" मैंने बात सँभालने की कोशिश की...

घबराकर तरुण ने अपना पैर वापस खींच लिया... पर इस सारे तमाशे से हमारी रजाई में जो हलचल हुई.. उससे शायद मीनू को विश्वास हो गया की अंदर ही अंदर कुछ 'घोटाला' हो रहा है...

अचानक मीनू ने 2-4 सिसकी सी ली और पिंकी के उठकर उसके पास जाते ही उसने फूट फूट कर रोना शुरू कर दिया...

"क्या हुआ दीदी?" पिंकी ने मीनू के चेहरे को अपने हाथों में लेकर पूछा....

"कुछ नहीं.. ..तू पढ़ ले..." मीनू ने उसको कहा और रोती रही...

"बताओ न क्या हो गया?" पिंकी वहीं खड़ी रही तो मुझे लगा की मुझे भी उठ जाना चाहिए... मैंने अपनी सलवार ठीक की और रजाई हटाकर उसके पास चली गयी," ये.. अचानक क्या हुआ आपको दीदी...?"

"कुछ नहीं.. मैं ठीक हूँ.." मेरे पूछते ही मीनू ने हल्के से गुस्से में कहा और अपने आँसू पुंछ कर चुप हो गयी....

मेरी दुबारा तरुण की रजाई में बैठने की हिम्मत नहीं हुई.. मैं पिंकी के पास ही जा बैठी...

"क्या हुआ अंजु? वहीं बैठ लो न.." पिंकी ने भोलेपन से मेरी और देखा...

"नहीं.. अब कौनसा पढ़ा रहे हैं...?" मैंने अपने चेहरे के भावों को पकड़े जाने से बचाने की कोशिश करते हुए जवाब दिया.....

मेरे अलग बैठने से शायद मीनू के जख्मों पर कुछ मरहम लगा.. थोड़ी ही देर बाद वो अचानक धीरे से बोल पड़ी," मेरे वहाँ तिल नहीं है!"

तरुण ने घूम कर उसको देखा.. समझ तो मैं भी गयी थी की 'तिल' कहाँ नहीं है.. पर भोली पिंकी न समझने के बावजूद मामले में कूद पड़ी..," क्या? कहाँ 'तिल' नहीं है दीदी...?"

मीनू ने भी पूरी तैयारी के बाद ही बोला था..," अरे 'तिल' नहीं.. 'दिल'.. मैं तो इस कागज के टुकड़े में से पढ़कर बोल रही थी.. जाने कहाँ से मेरी किताब में आ गया... पता नहीं.. ऐसा ही कुछ लिखा हुआ है.. 'देखना' " उसने कहा और कागज का वो टुकड़ा तरुण की और बढ़ा दिया...

तरुण ने कुछ देर उस कागज को देखा और फिर अपनी मुठ्ठी में दबा लिया...

"दिखाना भैया!" पिंकी ने हाथ बढाया...

"यूँही लिखी हुई किसी लाइन का आधा भाग लग रहा है....तू अपनी पढाई कर ले.." तरुण ने कहकर पिंकी को टरका दिया....

तरुण ने थोड़ी देर बाद उसी कागज पर दूसरी तरफ चुपके से कुछ लिखा और रजाई की साइड से चुपचाप मेरी और बढ़ा दिया... मैंने उसी तरफ छुपाकर उसको पढ़ा.. 'प्यार करना है क्या?' उस पर लिखा हुआ था.. मैंने कागज को पलट कर देखा.. दूसरी और लिखा हुआ था.... 'मेरे वहाँ 'तिल' नहीं है..'

दिल तो बहुत था चूत की खुजली मिटा डालने का.. पर 'माँ' बनने को कैसे तैयार होती... मैंने तरुण की और देखा और 'न' में अपना सर हिला दिया......

वह अपना सा मुँह लेकर मुझे घूरने लगा.. उसके बाद मैंने उससे नजरें ही नहीं मिलाई....

हमें चाय पिलाकर चाची जाने ही वाली थी की तरुण के दिमाग में जाने क्या आया," आओ मीनू.. थोड़ी देर तुम्हे पढ़ा दूँ...! फिर मैं जाऊँगा...."

मीनू का चेहरा अचानक खिल उठा.. उसने झट से अपनी किताब उठाई और तरुण के पास जा बैठी...

मैं और पिंकी दूसरी चारपाइयों पर लेट गये.. थोड़ी ही देर बाद पिंकी के खर्राटे भी सुनाई देने लगे... पर मैं भला कैसे सोती?
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10-02-2010, 12:17 PM
Post: #36
RE: कामांजलि
पर आज मैंने पहले ही एक दिमाग का काम कर लिया.. मैंने दूसरी और तकिया लगा लिया और उनकी और करवट लेकर लेट गयी अपनी रजाई को मैंने शुरू से ही इस तरह थोड़ा उपर उठाये रखा की मुझे उनकी पूरी चारपाई दिखाई देती रहे....आज मीनू कुछ ज्यादा ही बेसब्र दिखाई दे रही थी.. कुछ 15 मिनट ही हुए होंगे की जैसे ही तरुण ने पन्ने पलटने के लिये अपना हाथ रजाई से बाहर निकाला; मीनू ने पकड़ लिया.. मैं समझ गयी.. अब होगा खेल शुरू !

तरुण बिना कुछ बोले मीनू के चेहरे की और देखने लगा.. कुछ देर मीनू भी उसको ऐसे ही देखती रही.. अचानक उसकी आँखों से आँसू लुढक गये.. सच बता रही हूँ.. मीनू का मासूम और बेबस सा चेहरा देख मेरी भी आँखें नम हो गयी थी....

तरुण ने एक बार हमारी चारपाइयों की और देखा और अपना हाथ छुड़ा कर मीनू का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया.. मीनू अपने चेहरे को उसके हाथों में छुपा कर सुबकने लगी...

"ऐसे क्यूँ कर रही है पागल? इनमे से कोई उठ जायेगी.." तरुण ने उसके आँसूओं को पूँछते हुए धीरे से फुसफुसाया...

मीनू के मुँह से निकलने वाली आवाज भारी और भरभराई हुई सी थी..," तुम्हारी नाराजगी मुझसे सहन नहीं होती तरुण.. मैं मर जाउंगी.. तुम मुझे यूँ क्यूँ तड़पा रहे हो.. तुम्हे पता है न की मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ..."

मीनू की आँखों से आँसू नहीं थम रहे थे.. मैंने भी अपनी आँखों से आँसू पूछे.. मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.. मेरे आँसूओं के कारण...!

"मै कहाँ तड़पाता हूँ तुम्हे? तुम्हारे बारे में कुछ भी सुन लेता हूँ तो मुझसे सहन ही नहीं होता.. मैं पागल हूँ थोड़ा सा.. पर ये पागलपन भी तो तुम्हारे कारण ही है जाना.." तरुण ने थोड़ा आगे सरक कर मीनू को अपनी तरफ खींच लिया... मीनू ने आगे झुक कर तरुण की छाती पर अपने गाल टिका दिये..

उसका चेहरा मेरी ही और था.. अब उसके चेहरे पर पर्याप्त सकून झलक रहा था.. ऐसे ही झुके हुए उसने तरुण से कहा," तुम्हे अंजलि मुझसे भी अच्छी लगती है न?"

"ये क्या बोल रही है पागल? मुझे इससे क्या मतलब? मुझे तो तुमसे ज्यादा प्यारा इस पूरी दुनिया में कोई नहीं लगता.. तुम सोच भी नहीं सकती की मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ..." साला मगरमच्छ की औलाद.. बोलते हुए रोने की एक्टिंग करने लगा.....

मीनू ने तुरंत अपना चेहरा उपर किया और आँखें बंद करके तरुण के गालों पर अपने होंठ रख दिये..," पर तुम कह रहे थे न.. की अंजु मुझसे तो सुन्दर ही है.." तरुण को किस करके सीधी होते मीनू बोली...

"वो तो मैं तुम्हे जलाने के लिये बोल रहा था... तुमसे इसका क्या मुकाबला?" दिल तो कर रहा था की रजाई फैंक कर उसके सामने खड़ी होकर पूंछूं.. की 'अब बोल' .. पर मुझे तिल वाली रामायण भी देखनी थी.... इसीलिए दांत पीस कर रह गयी...

"अब तक तो मुझे भी यही लग रहा था की तुम मुझे जला रहे हो.. पर तब मुझे लगा की तुम और अंजु एक दूसरे को रजाई के अंदर छेड रहे हो.. तब मुझसे सहन नहीं हुआ और मैं रोने लगी..." मीनू ने अपने चेहरे को फिर से उसकी छाती पर टिका दिया...

तरुण उसकी कमर में हाथ फेरता हुआ बोला,"छोडो न... पर तुमने मुझे परसों क्यूँ नहीं बताया की तुम्हारे वहाँ 'तिल' नहीं है.. परसों ही मामला खत्म हो जाता.."

"मुझे क्या पता था की तिल है की नहीं.. कल मैंने..." मीनू ने कहा और अचानक शर्मा गयी...

"कल क्या? बोलो न मीनू..." तरुण ने आगे पूछा...

मीनू सीधी हुई और शरारत से उसकी आँखों में घूरती हुई बोली," बेशर्म! बस बता दिया न की तिल नहीं है.. मेरी बात पर विश्वास नहीं है क्या?"

"बिना देखे कैसे होगा.. देख कर ही विश्वास हो सकता है की 'तिल' है की नहीं.." तरुण ने कहा और शरारत से मुस्कराने लगा...

मीनू का चेहरा अचानक लाल हो गया..उसने तरुण से नजरें चुराई, मिलाई और फिर चुरा कर बोली," देखो.. देखो.. तुम फिर लड़ाई वाला काम कर रहे हो.. मैंने वैसे भी कल शाम से खाना नहीं खाया है.. !"

"लड़ाई वाला काम तो तुम कर रही हो मीनू.. जब तक देखूँगा नहीं.. मुझे विश्वास कैसे होगा? बोलो! ऐसे ही विश्वास करना होता तो लड़ाई होती ही क्यूँ? मैं परसों ही न मान जाता तुम्हारी बात...." तरुण ने अपनी जिद पर अड़े रहकर कहा...

"तुम मुझे फिर से रुला कर जाओगे.. है न?" मीनू के चेहरे का रंग उड़ सा गया...

तरुण ने दोनों के पैरों पर रखी रजाई उठाकर खुद ओढ़ ली और उसको खोल कर मीनू की तरफ हाथ बढ़ा कर बोला," आओ.. यहाँ आ जाओ मेरी जाना!"

"नहीं!" मीनू ने नजरें झुका ली और अपने होंठ बाहर निकल लिये...

"आओ न.. क्या इतना भी नहीं कर सकती अब?" तरुण ने बेकरार होकर कहा...

"रुको.. पहले मैं उपर वाला दरवाजा बंद करके आती हूँ.." कहकर मीनू उठी और उपर वाले दरवाजे के साथ बाहर वाला भी बंद कर दिया.. फिर तरुण के पास आकर कहा," जल्दी छोड़ दोगे न?"

"आओ न!" तरुण ने मीनू को पकड़ कर खींच लिया... मीनू हल्की हल्की शरमाई हुई उसकी गोद में जा गिरी....

रजाई से बाहर अब सिर्फ दोनों के चेहरे दिखाई दे रहे थे.. तरुण ने इस तरह मीनू को अपनी गोद में बिठा लिया था की मीनू की कमर तरुण की छाती से पूरी तरह चिपकी हुई होगी.. और उसके सुडोल चूतड़ ठीक तरुण की जाँघों के बीच रखे होंगे... मैं समझ नहीं पा रही थी.. मीनू को खुद पर इतना काबू कैसे है.. हालाँकि आँखें उसकी भी बंद हो गयी थी.. पर मैं उसकी जगह होती तो नजारा ही दूसरा होता...
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10-02-2010, 12:17 PM
Post: #37
RE: कामांजलि
पर आज मैंने पहले ही एक दिमाग का काम कर लिया.. मैंने दूसरी और तकिया लगा लिया और उनकी और करवट लेकर लेट गयी अपनी रजाई को मैंने शुरू से ही इस तरह थोड़ा उपर उठाये रखा की मुझे उनकी पूरी चारपाई दिखाई देती रहे....आज मीनू कुछ ज्यादा ही बेसब्र दिखाई दे रही थी.. कुछ 15 मिनट ही हुए होंगे की जैसे ही तरुण ने पन्ने पलटने के लिये अपना हाथ रजाई से बाहर निकाला; मीनू ने पकड़ लिया.. मैं समझ गयी.. अब होगा खेल शुरू !

तरुण बिना कुछ बोले मीनू के चेहरे की और देखने लगा.. कुछ देर मीनू भी उसको ऐसे ही देखती रही.. अचानक उसकी आँखों से आँसू लुढक गये.. सच बता रही हूँ.. मीनू का मासूम और बेबस सा चेहरा देख मेरी भी आँखें नम हो गयी थी....

तरुण ने एक बार हमारी चारपाइयों की और देखा और अपना हाथ छुड़ा कर मीनू का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया.. मीनू अपने चेहरे को उसके हाथों में छुपा कर सुबकने लगी...

"ऐसे क्यूँ कर रही है पागल? इनमे से कोई उठ जायेगी.." तरुण ने उसके आँसूओं को पूँछते हुए धीरे से फुसफुसाया...

मीनू के मुँह से निकलने वाली आवाज भारी और भरभराई हुई सी थी..," तुम्हारी नाराजगी मुझसे सहन नहीं होती तरुण.. मैं मर जाउंगी.. तुम मुझे यूँ क्यूँ तड़पा रहे हो.. तुम्हे पता है न की मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ..."

मीनू की आँखों से आँसू नहीं थम रहे थे.. मैंने भी अपनी आँखों से आँसू पूछे.. मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.. मेरे आँसूओं के कारण...!

"मै कहाँ तड़पाता हूँ तुम्हे? तुम्हारे बारे में कुछ भी सुन लेता हूँ तो मुझसे सहन ही नहीं होता.. मैं पागल हूँ थोड़ा सा.. पर ये पागलपन भी तो तुम्हारे कारण ही है जान.." तरुण ने थोड़ा आगे सरक कर मीनू को अपनी तरफ खींच लिया... मीनू ने आगे झुक कर तरुण की छाती पर अपने गाल टिका दिये..

उसका चेहरा मेरी ही और था.. अब उसके चेहरे पर पर्याप्त सकून झलक रहा था.. ऐसे ही झुके हुए उसने तरुण से कहा," तुम्हे अंजलि मुझसे भी अच्छी लगती है न?"

"ये क्या बोल रही है पागल? मुझे इससे क्या मतलब? मुझे तो तुमसे ज्यादा प्यारा इस पूरी दुनिया में कोई नहीं लगता.. तुम सोच भी नहीं सकती की मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ..." साला मगरमच्छ की औलाद.. बोलते हुए रोने की एक्टिंग करने लगा.....

मीनू ने तुरंत अपना चेहरा उपर किया और आँखें बंद करके तरुण के गालों पर अपने होंठ रख दिये..," पर तुम कह रहे थे न.. की अंजु मुझसे तो सुन्दर ही है.." तरुण को किस करके सीधी होते मीनू बोली...

"वो तो मैं तुम्हे जलाने के लिये बोल रहा था... तुमसे इसका क्या मुकाबला?" दिल तो कर रहा था की रजाई फैंक कर उसके सामने खड़ी होकर पूंछूं.. की 'अब बोल' .. पर मुझे तिल वाली रामायण भी देखनी थी.... इसीलिए दांत पीस कर रह गयी...

"अब तक तो मुझे भी यही लग रहा था की तुम मुझे जला रहे हो.. पर तब मुझे लगा की तुम और अंजु एक दूसरे को रजाई के अंदर छेड रहे हो.. तब मुझसे सहन नहीं हुआ और मैं रोने लगी..." मीनू ने अपने चेहरे को फिर से उसकी छाती पर टिका दिया...

तरुण उसकी कमर में हाथ फेरता हुआ बोला,"छोडो न... पर तुमने मुझे परसों क्यूँ नहीं बताया की तुम्हारे वहाँ 'तिल' नहीं है.. परसों ही मामला खत्म हो जाता.."

"मुझे क्या पता था की तिल है की नहीं.. कल मैंने..." मीनू ने कहा और अचानक शर्मा गयी...

"कल क्या? बोलो न मीनू..." तरुण ने आगे पूछा...

मीनू सीधी हुई और शरारत से उसकी आँखों में घूरती हुई बोली," बेशर्म! बस बता दिया न की तिल नहीं है.. मेरी बात पर विश्वास नहीं है क्या?"
"बिना देखे कैसे होगा.. देख कर ही विश्वास हो सकता है की 'तिल' है की नहीं.." तरुण ने कहा और शरारत से मुस्कराने लगा...

मीनू का चेहरा अचानक लाल हो गया..उसने तरुण से नजरें चुराई, मिलाई और फिर चुरा कर बोली," देखो.. देखो.. तुम फिर लड़ाई वाला काम कर रहे हो.. मैंने वैसे भी कल शाम से खाना नहीं खाया है.. !"

"लड़ाई वाला काम तो तुम कर रही हो मीनू.. जब तक देखूँगा नहीं.. मुझे विश्वास कैसे होगा? बोलो! ऐसे ही विश्वास करना होता तो लड़ाई होती ही क्यूँ? मैं परसों ही न मान जाता तुम्हारी बात...." तरुण ने अपनी जिद पर अड़े रहकर कहा...

"तुम मुझे फिर से रुला कर जाओगे.. है न?" मीनू के चेहरे का रंग उड़ सा गया...

तरुण ने दोनों के पैरों पर रखी रजाई उठाकर खुद ओढ़ ली और उसको खोल कर मीनू की तरफ हाथ बढ़ा कर बोला," आओ.. यहाँ आ जाओ मेरी जान!"

"नहीं!" मीनू ने नजरें झुका ली और अपने होंठ बाहर निकल लिये...

"आओ न.. क्या इतना भी नहीं कर सकती अब?" तरुण ने बेकरार होकर कहा...

"रुको.. पहले मैं उपर वाला दरवाजा बंद करके आती हूँ.." कहकर मीनू उठी और उपर वाले दरवाजे के साथ बाहर वाला भी बंद कर दिया.. फिर तरुण के पास आकर कहा," जल्दी छोड़ दोगे न?"

"आओ न!" तरुण ने मीनू को पकड़ कर खींच लिया... मीनू हल्की हल्की शरमाई हुई उसकी गोद में जा गिरी....
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10-02-2010, 12:18 PM
Post: #38
RE: कामांजलि
रजाई से बाहर अब सिर्फ दोनों के चेहरे दिखाई दे रहे थे.. तरुण ने इस तरह मीनू को अपनी गोद में बिठा लिया था की मीनू की कमर तरुण की छाती से पूरी तरह चिपकी हुई होगी.. और उसके सुडोल चूतड़ ठीक तरुण की जाँघों के बीच रखे होंगे... मैं समझ नहीं पा रही थी.. मीनू को खुद पर इतना काबू कैसे है.. हालाँकि आँखें उसकी भी बंद हो गयी थी.. पर मैं उसकी जगह होती तो नजारा ही दूसरा होता...

तरुण ने उसकी गरदन पर अपने होंठ रख दिये.. मीनू सिसक उठी...

"कब तक मुझे यूँ तड़पाओगी जान?" तरुण ने हौले से उसके कानों में सांस छोड़ी...

"आअह.. जब तक.. मेरी पढाई पूरी नहीं हो जाती.. और घर वाले हमारी शादी के लिये तैयार नहीं हो जाते... या फिर... हम घर छोड़ कर भाग नहीं जाते..." मीनू ने सिसकते हुए कहा...मीनू की इस बात ने मेरे दिल में प्यार करते ही 'माँ' बन जाने के डर को और भी पुख्ता कर दिया....

"पर तब तक तो मैं मर ही जाऊँगा..!" तरुण ने उसको अपनी और खींच लिया...

मीनू का चेहरा चमक उठा..," नहीं मरोगे जान.. मैं तुम्हे मरने नहीं दूँगी.." मीनू ने कहा और अपनी गरदन घुमा कर उसके होंठों को चूम लिया..

तरुण ने अपना हाथ बाहर निकाला और उसके गालों को अपने हाथ से पकड़ लिया.. मीनू की आँखें बंद थी.. तरुण ने अपने होंठ खोले और मीनू के होंठों को दबा कर चूसने लगा... ऐसा करते हुए उनकी रजाई मेरी तरफ से नीचे खिसक गयी...तरुण काफी देर तक उसके होंठों को चूसता रहा.. उसका दूसरा हाथ मीनू के पेट पर था और वो रह रह कर मीनू को पीछे खींच कर अपनी जाँघों के उपर चढ़ाने का कर रहा था.. पता नहीं अनजाने में या जानबूझ कर.. मीनू रह रह कर अपने चूतड़ों को आगे खिसका रही थी....तरुण ने जब मीनू के होंठों को छोड़ा तो उसकी साँसे बुरी तरह उखड़ी हुई थी.. हाँफती हुई मीनू अपने आप को छुड़ा कर उसके सामने जा बैठी," तुम बहुत गंदे हो.. एक बार की कह कर.... मुश्किल से ही छोड़ते हो.. आज के बाद कभी तुम्हारी बातों में नहीं आउंगी..."

मीनू की नजरें ये सब बोलते हुए लजाई हुई थी... उसके चेहरे की मुस्कान और लज्जा के कारण उसके गालों पर चढ़ा हुआ गुलाबी रंग ये बता रहा था की अच्छा तो उसको भी बहुत लग रहा था... पर शायद मेरी तरह वह भी “माँ” बनने से डर रही होगी.....

" देखो.. मैं मजाक नहीं कर रहा.. पर 'तिल' तो तुम्हे दिखाना ही पड़ेगा...!" तरुण ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा.. शायद मीनू के रसीले गुलाबी होंठों की मिठास अभी तक तरुण के होंठों पर बनी हुई थी.....

"तुम तो पागल हो.. मैं कैसे दिखाउंगी तुम्हे 'वहाँ' .. मुझे बहुत शर्म आ रही है.. कल खुद देखते हुए भी मैं शर्मिंदा हो गयी थी..." मीनू ने प्यार से दुत्कार कर तरुण को कहा....

"पर तुम खुद कैसे देख सकती हो.. अच्छी तरह...!" तरुण ने तर्क दिया...

"वो.. वो मैंने.. शीशे में देखा था.." मीनू ने कहते ही अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया...

"पर क्या तुम.. मेरे दिल की शांति के लिये इतना भी नहीं कर सकती..." तरुण ने उसके हाथ पकड़ कर चेहरे से हटा दिये..

लजाई हुई मीनू ने अपने सर को बिल्कुल नीचे झुका लिया," नहीं.. बता तो दिया... मुझे शर्म आ रही है...!"

"ये तो तुम बहाना बनाने वाली बात कर रही हो.. मुझसे भी शरमाओगी क्या? मैंने तुम्हारी मर्जी के बैगैर कुछ किया है क्या आज तक... मैं आखिरी बार पूछ रहा हूँ मीनू.. दिखा रही हो की नहीं..?" तरुण थोड़ा तैश में आ गया....

मीनू के चेहरे से मजबूरी और उदासी झलकने लगी," पर.. तुम समझते क्यूँ नहीं.. मुझे शर्म आ रही है जान!"

"आने दो.. शर्म का क्या है? ये तो आती जाती रहती है... पर इस बार अगर मैं चला गया तो वापस नहीं आऊँगा... सोच लो!" तरुण ने उसको फिर से छोड़ देने की धमकी दी....

मायूस मीनू को आखिरकर हार माननी ही पड़ी," पर.. वादा करो की तुम और कुछ नहीं करोगे.. बोलो!"

"हाँ.. वादा रहा.. देखने के बाद जो तुम्हारी मर्जी होगी वही करूँगा..." तरुण की आँखें चमक उठी.. पर शर्म के मारे मीनू अपनी नजरें नहीं उठा पा रही थी....

"ठीक है.." मीनू ने शर्मा कर और मुँह बना कर कहा और लेट कर अपने चेहरे पर तकिया रख लिया..

उसकी नजाकत देख कर मुझे भी उस पर तरस आ रहा था.. पर तरुण को इस बात से कोई मतलब नहीं था शायद.. मीनू के आत्मसमपर्ण करते ही तरुण के जैसे मुँह मैं पानी उतर आया," अब ऐसे क्यूँ लेट गयी.. शर्माना छोड़ दो..!"

"मुझे नहीं पता.. जो कुछ देखना है देख लो.." मीनू ने अपना चेहरा ढके हुए ही कहा....," उपर से कोई आ जाये तो दरवाजा खोल कर भागने से पहले मुझे ढक देना.. मैं सो रही हूँ..." मीनू ने शायद अपनी झिझक छिपाने के लिये ही ऐसा बोला होगा.. वरना ऐसी हालत में कोई सो सकता है भला...

तरुण ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया.. उसको तो जैसे अलादीन का चिराग मिल गया था.. थोड़ा आगे होकर उसने मीनू की टांगों को सीधा करके उनके बीच बैठ गया.. मुझे मीनू का कंपकपाता हुआ बदन साफ़ दिख रहा था...
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10-02-2010, 12:19 PM
Post: #39
RE: कामांजलि
अगले ही पल तरुण मीनू की कमीज उपर करके उसके शमीज को उसकी सलवार से बाहर खींचने लगा.. शायद शर्म के मारे मीनू दोहरी सी होकर अपनी टांगों को मोड़ने की कोशिश करने लगी.. पर तरुण ने उसकी टांगों को अपनी कोहनियों के नीचे दबा लिया....

"इसको क्यूँ निकल रहे हो? जल्दी करो न.." मीनू ने सिसकते हुए प्राथना करी...

"रुको भी.. अब तुम चुप हो जाओ.. मुझे अपने हिसाब से देखने दो.." तरुण ने कहा और उसका शमीज बाहर निकल कर उसकी कमीज के साथ ही उसकी छातीयों तक उपर चढ़ा दिया...

लेटी हुई होने के कारण मैं सब कुछ तो नहीं देख पाई.. पर मीनू का पेट भी मेरी तरह ही चिकना गोरा और बहुत ही कमसिन था.. चर्बी तो जैसे वहाँ थी ही नहीं.. रह रह कर वो उचक रही थी..

अचानक तरुण उस पर झुक गया और शायद उसकी नाभि पर अपने होंठ रख दिये... मुझे महसूस हुआ जैसे उसके होंठ मेरे ही बदन पर आकर टिक गये हों.. मैंने अपना हाथ अपनी सलवार में घुसा लिया...

मीनू सिसक उठी," तुम देखने के बहाने अपना मतलब निकल रहे हो.. जल्दी करो न प्लीज!"

"थोड़ा मतलब भी निकल जाने दो जान.. ऐसा मौका तुम मुझे दुबारा तो देने से रही... क्या करूँ.. तुम्हारा हर अंग इतना प्यारा है की दिल करता है की आगे बढूँ ही न.. तुम्हारा जो कुछ भी देखता हूँ.. उसी पर दिल आ जाता है...." तरुण ने अपना सर उठाकर मुस्कराते हुए कहा और फिर से झुकाते हुए अपनी जीभ निकल कर मीनू के पेट को यहाँ वहाँ चाटने लगा...

"ओओओह्हह.. उम्म्मम्म.. आआह..." मीनू रह रह कर होने वाली गुदगुदी से उछलती रही और आहें भरती रही... पर कुछ बोली नहीं...

अचानक तरुण ने मीनू का नाडा पकड़ कर खींच लिया और इसके साथ ही एक बार फिर मीनू ने अपनी टांगों को मोड़ने की कोशिश की.. पर ज्यादा कुछ वह कर नहीं पाई.. तरुण की दोनों कोहनियाँ उसकी जाँघों पर थी.. वह मचल कर रह गयी,

" प्लीज.. जल्दी देख लो.. मुझे बहुत शर्म आ रही है..." कहकर उसने अपनी टांगें ढीली छोड़ दी...

तरुण ने एक बार फिर उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया..और उसकी सलवार उपर से नीचे सरका दी..

सलवार के नीचे होते ही मुझे मीनू की सफ़ेद कच्छी और उसके नीचे उसकी गोरी गुदाज़ जांघें थोड़ी सी नंगी दिखाई देने लगी...

तरुण उसकी जाँघों के बीच इस तरह ललचाया हुआ देख रहा था जैसे उसने पहली बार किसी लड़की को इस तरह देखा हो.. उसकी आँखें कामुकता के मारे फैल सी गयी...

तभी एक बार फिर मीनू की तडपती हुई आवाज मेरे कानों तक आई," अब निकल लो इसको भी.. जल्दी देख लो न..."

तरुण ने मेरी पलक झपकने से पहले ही उसकी बात का अक्षरश पालन किया... वह कच्छी को उपर से नीचे सरका चूका था..," थोड़ी उपर उठो!" कहकर उसने मीनू के चूतड़ों के नीचे हाथ दिये और सलवार समेत उसकी कच्छी को नीचे खींच लिया....

तरुण की हालत देखते ही बन रही थी... अचानक उसके मुँह से लार टपक कर मीनू की जाँघों के बीच जा गिरी.. मेरे ख्याल से उसकी चूत पर ही गिरी होगी जाकर...

"मीनू.. मुझे नहीं पता था की चूत इतनी प्यारी है तुम्हारी.. देखो न.. कैसे फुदक रही है.. छोटी सी मछली की तरह.. सच कहूँ.. तुम मेरे साथ बहुत बुरा कर रही हो.. अपने सबसे कीमती अंग से मुझको इतनी दूर रख कर... जी करता है की...."

"देख लिया... अब मुझे छोडो.." मीनू अपनी सलवार को उपर करने के लिये अपने हाथ नीचे लायी तो तरुण ने उनको वहीं दबोच लिया," ऐसे थोड़े ही दिखाई देगा.. यहाँ से तो बस उपर की ही दिख रही है..."

तरुण उसकी टांगों के बीच से निकला और बोला," उपर टांगें करो.. इसकी 'पपोटी' अच्छी तरह तभी दिखाई देंगी..."

"क्या है ये?" मीनू ने कहा तो मुझे उसकी बातों में विरोध नहीं लगा.. बस शर्म ही लग रही थी बस! तरुण ने उसकी जांघें उपर उठाई तो उसने कोई विरोध न किया...

मीनू की जांघें उपर होते ही उसकी चूत की सुंदरता देख कर मेरे मुँह से भी पानी टपकने लगा.. और मेरी चूत से भी..! तरुण झूठ नहीं बोल रहा था.. उसकी चूत की फांकें मेरी चूत की फांकों से पतली थी..

पर बहुत ही प्यारी प्यारी थी... एक दम गोरी... हल्के हल्के काले बालों में भी उसका रसीलापन और नजाकर मुझे दूर से ही दिखाई दे रही थी...

पतली पतली फांकों के बीच लंबी सी दरार ऐसे लग रही थी जैसे पहले कभी खुली ही न हो.. पेशाब करने के लिये भी नहीं.. दोनों फांकें आपस में चिपकी हुई सी थी...

अचानक तरुण ने उसकी सलवार और कच्छी को घुटनों से नीचे करके जाँघों को और पीछे धकेल कर खोल दिया..इसके साथ ही मीनू की चूत और उपर उठ गयी और उसकी दरार ने भी हल्का सा मुँह खोल दिया..

इसके साथ ही उसके गोल मटोल चूतड़ों की कसावट भी देखते ही बन रही थी... तरुण चूत की फांकों पर अपनी उंगली फेरने लगा...

"मैं मर जाउंगी तरुण.. प्लीज.. ऐसा ....मत करना.. प्लीज.." मीनू हाँफते हुए रुक रुक कर अपनी बात कह रही थी....

"कुछ नहीं कर रहा जाना.. मैं तो बस छू कर देख रहा हूँ... तुमने तो मुझे पागल सा कर दिया है... सच.. एक बात मान लोगी...?" तरुण ने रीकुएस्ट की...

"तिल नहीं है न जान!" मीनू तड़प कर बोली...."हाँ.. नहीं है.. आई लव यू जान.. आज के बाद मैं तुमसे कभी भी लड़ाई नहीं करूँगा.. न ही तुम पर शक करूँगा.. तुम्हारी कसम!"

तरुण ने कहा.. "सच!!!" मीनू एक पल को सब कुछ भूल कर ताकिये से मुँह हटा कर बोली.. फिर तरुण को अपनी आँखों में देखते पाकर शर्मा गयी...

"हाँ.. जाना.. प्लीज एक बात मान लो..." तरुण ने प्यार से कहा...

"क्याआआ? मीनू सिसकते हुए बोली.. उसने एक बार फिर अपना मुँह छिपा लिया था...

"एक बार इसको अपने होंठों से चाट लूं क्या?" तरुण ने अपनी मंशा जाहिर की....
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10-02-2010, 12:19 PM
Post: #40
RE: कामांजलि
अब तक शायद मीनू की जवान हसरतें भी शायद बेकाबू हो चुकी थी," मुझे हमेशा इसी तरह प्यार करोगे न जान!" मीनू ने पहली बार नंगी होने के बाद तरुण से नजरें मिलाई....

तरुण उसकी जाँघों को छोड़ कर उपर गया और मीनू के होंठों को चूम लिया," तुम्हारी कसम जान.. तुमसे दूर होने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता..." तरुण ने कहा और नीचे आ गया...

मैं ये देख कर हैरान रह गयी की मीनू ने इस बार अपनी जांघें अपने आप ही उपर उठा दी.... तरुण थोड़ा और पीछे आकर उसकी चूत पर झुक गया... चूत के होंठों पर तरुण के होंठों को महसूस करते ही मीनू उछल पड़ी,"आअहह ..."

"कैसा लग रहा है जान?" तरुण ने पूछा...

"तुम कर लो..!" मीनू ने सिसकते हुए इतना ही कहा...

"बताओ न.. कैसा लग रहा है.." तरुण ने फिर पूछा... "आह.. कह तो रही हूँ.. कर लो.. अब और कैसे बताऊँ.. बहुत अच्छा लग रहा है.. बस!" मीनू ने कहा और शर्मा कर अपने हाथों से अपना चेहरा ढक लिया...

खुश होकर तरुण उसकी चूत पर टूट पड़ा.. अपनी जीभ बाहर निकल कर उसने चूत के निचले हिस्से पर रखी और उसको लहराता हुआ उपर तक समेत लाया.. मीनू बदहवास हो गयी.. सिसकियाँ और आहें भरते हुए उसने खुद ही अपनी जांघों को पकड़ लिया और तरुण का काम आसान कर दिया...

मेरा बुरा हाल हो चूका था.. उन्होंने ध्यान नहीं दिया होगा.. पर मेरी रजाई अब मेरे चूत को मसलने के कारण लगातार हिल रही थी...
तरुण ने अपनी एक उंगली मीनू की चूत की फांकों के बीच रख दी और उसकी दोनों 'पपोटीयाँ' अपने होंठों में दबाकर चूसने लगा...

मीनू पागल सी हुई जा रही थी.. अब वह तरुण के होंठों को बार बार चूत के मनचाहे हिस्से पर महसूस करने के लिये अपने चूतड़ों को उपर नीचे हिलाने लगी थी.. ऐसा करते हुए वह अचानक चौंक पड़ी," क्या कर रहे हो?"

"कुछ नहीं.. बस हल्की सी उंगली घुसाई है..." तरुण मुस्कराता हुआ बोला...

"नहीं.. बहुत दर्द होगा.. प्लीज अंदर मत करना.." मीनू कसमसा कर बोली....

तरुण मुस्कराता हुआ बोला," अब तक तो नहीं हुआ न?"

"नहीं.. पर तुम अंदर मत डालन प्लीज..." मीनू ने प्राथना सी की...

"मेरी पूरी उंगली तुम्हारी चूत में है.." तरुण हँसने लगा...

"क्या? सच..? " मीनू हैरान होकर जाँघों को छोड़ कोहनियों के बल उठ बैठी.. और चौंक कर अपनी चूत में फंसी हुई तरुण की उंगली को देखती हुई बोली," पर मैंने तो सुना था की पहली बार बहुत दर्द होता है.." वह आश्चर्य से आँखें चौड़ी किये अपनी चूत की दरार में अंदर गायब हो चुकी उंगली को देखती रही....

तरुण ने उसकी और देख कर मुस्कराते हुए उंगली को बाहर खींचा और फिर से अंदर धकेल दिया... अब मीनू उंगली को अंदर जाते देख रही थी.. इसीलिए उछल सी पड़ी,"आअह..."

"क्या? दर्द हो रहा है या मजा आ रहा है...." तरुण ने मुस्कराते हुए पूछा...

"आई.. लव यू जान... आह.. बहुत मज़ा आ रहा हहहहै..." कहकर मीनू ने आँखें बंद कर ली....

"लेकिन तुमसे ये किसने कहा की बहुत दर्द होता है...?" तरुण ने उंगली को लगातार अंदर बाहर करते हुए पूछा....

"छोडो न.. तुम करो न जाना... बहुत.. मजा आअ.. रहा है... आआईईईइ आआअहहह " मीनू की आवाज उसके नितंबो के साथ ही थिरक रही थी.... उसने बैठ कर तरुण के होंठों को अपने होंठों में दबोच लिया... तरुण के तो वारे के न्यारे हो गये होंगे... साले कुत्ते के.. ये उंगली वाला मजा तो मुझे भी चाहिए.. मैं तड़प उठी...

तरुण उसके होंठों को छोड़ता हुआ बोला," पूरा कर ले क्या?"

"क्या?" मीनू समझ नहीं पाई.. और न ही मैं...

"पूरा प्यार... अपना लंड इसके अंदर डाल दूँ...!" तरुण ने कहा....

मचलती हुई मीनू उसकी उंगली की स्पीड कम हो जाने से विचलित सी हो गयी..," हाँ.. कर दो.. ज्यादा दर्द नहीं होगा न?" मीनू प्यार से उसको देखती हुई बोली...

"मैं पागल हूँ क्या? जो ज्यादा दर्द करूँगा... असली मजा तो उसी में आता है.. जब यहाँ से बच्चा निकल सकता है तो उसके अंदर जाने में क्या होगा... और फिर उस मजे के लिये अगर थोड़ा बहुत दर्द हो भी जाये तो क्या है..? सोच लो!"

मीनू कुछ देर सोचने के बाद अपना सर हिलाती हुई बोली," हाँ.. कर दो... कर दो जान.. इससे भी ज्यादा मजा आयेगा क्या?"

"तुम बस देखती जाओ जान... बस अपनी आँखें बंद करके सीधी लेट जाओ... फिर देखो मैं तुम्हे कहाँ का कहाँ ले जाता हूँ...." तरुण बोला.....

मीनू निश्चिन्त होकर आँखें बंद करके लेट गयी.. तरुण ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और दनादन उसके फोटो खींचने लगा... मेरी समझ में नहीं आया वो ऐसा कर क्यूँ रहा है... उसने मीनू की चूत का क्लोज अप लिया... फिर उसकी जाँघों और चूत का लिया...

और फिर थोड़ा नीचे करके शायद उसकी नंगी जाँघों से लेकर उसके चेहरे तक का फोटो ले लिया....
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